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छत्तीसगढ़ / क्लोनिंग में करोड़ों खर्च, फिर भी नहीं हो पा रहा, ‘वनभैंस का संरक्षण’

असम के काजीरंगा नेशनल पार्क में विचरण करते वन भैंसे। छत्तीसगढ़ सरकार ने असम में वन भैंसों का परिक्षण कर एक वहां से एक नर और मादा भैंसा राज्य में आयात किया। तस्वीर– ग्रेगोइरे डबॉइस /फ्लिकर

आलोक प्रकाश पुतुल

  • छत्तीसगढ़ का राजकीय पशु वनभैंस की नस्ल ख़तरे में है। राज्य सरकार का दावा है कि राज्य में 25 से 35 वनभैंसे मौजूद हैं पर इनकी गणना नहीं हो सकी है।
  • 2014 में एक वनभैंस की क्लोनिंग भी की गई। सरकार का दावा था कि किसी वन्यजीव की यह पहली क्लोनिंग है लेकिन इस क्लोन के वनभैंस होने पर भी संशय बना हुआ है।
  • छत्तीसगढ़ सरकार पिछले साल असम के मानस अभयारण्य से एक जोड़ी वनभैंसे लाई है। उम्र कम होने के कारण, इनसे वंशवृद्धि का मामला अटका हुआ है।

छत्तीसगढ़ का राजकीय पशु वनभैंस ख़तरे में है। सरकार की तमाम कोशिशों के बाद भी राज्य में वनभैंस की वंश वृद्धि नहीं हो पा रही है। क्लोनिंग से लेकर असम से वनभैंसों को लाने जैसे तमाम प्रयोग किये जा चुके हैं। लेकिन वनभैंस की आबादी बढ़ने का नाम नहीं ले रही है।

राज्य सरकार के अनुसार पूरे राज्य में वनभैंसों की संख्या 25 से 35 तक होने का अनुमान है। हालांकि जिन वनभैंसों की गणना संभव हो पाई है, उसकी कुल संख्या राज्य में महज 13 है। इनमें दस वनभैंस सीतानदी उदंती टाइगर रिज़र्व में हैं, जबकि असम के मानस राष्ट्रीय उद्यान से लाए गये दो वनभैंसों को बारनवापारा में रखा गया है। इसी तरह एक वनभैंस के क्लोन को रायपुर के नंदनवन जंगल सफारी में रखा गया है।

राज्य सरकार की चिंता इसलिए भी बढ़ गई है क्योंकि साल दर साल, एक-एक कर वनभैंसों की मौत होती जा रही है। हालत ये है कि वन विभाग के अधिकारी वनभैंस के साथ पालतू भैंसों के प्रजनन से पैदा हुए मादा वनभैंसों के सहारे आबादी बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं। हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि इस तरह की कोशिशों से वनभैंस की नस्ल की शुद्धता प्रभावित होगी और इसके दूरगामी परिणाम नकारात्मक हो सकते हैं।

सिमटती वनभैंसों की आबादी

भारत के वन्यजीव संरक्षण क़ानून 1972 के तहत अनुसूची 1 में श्रेणीबद्ध, वनभैंस यानी Bubalus arnee को इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंज़रवेशन ऑफ नेचर की रेड डेटा बुक में लुप्तप्राय के रूप में सूचीबद्ध किया गया है। अपने लंबे सींग और 150-190 सेंटीमीटर की ऊंचाई वाले वनभैंस का वजन 800 से 1200 किलोग्राम तक होता है। हालांकि मादा वनभैंस का वजन इसकी तुलना में कम होता है। लगातार होने वाले शिकार, प्राकृतिक रहवास क्षेत्र में परिवर्तन, पालतु भैंसों के साथ संसर्ग के कारण अनुवांशिक विकार और बीमारियों के कारण वनभैंस की नस्ल पूरी दुनिया में सिमटती चली गई है। माना जाता है कि आज की तारीख़ में पूरी दुनिया में वनभैंसों की संख्या चार हज़ार से भी कम है।

किसी समय नेपाल, बांग्लादेश, श्रीलंका, भूटान, थाइलैंड, वियतनाम, कंबोडिया, म्यांमार, जावा, सुमात्रा, मलेशिया जैसे देशों में वनभैंस बड़ी संख्या में पाये जाते थे। लेकिन पिछली शताब्दी में ही यह वनभैंस कई देशों के नक़्शे से गायब हो गये। हालत ये है कि हाथी और गेंडा के बाद भारत में पाया जाने वाला सबसे बड़ा स्तनपायी जानवर वनभैंस, आज अपना अस्तित्व बचाने के लिए जूझ रहा है।

आधी सदी पहले तक भारत में अरुणाचल प्रदेश, पश्चिम बंगाल, ओडिशा, आंध्रप्रदेश, महाराष्ट्र और बिहार के इलाकों में वनभैंसों की अच्छी आबादी के प्रमाण मिलते हैं। लेकिन धीरे-धीरे इन राज्यों में वनभैंसों की संख्या कम होती चली गई। विशेषज्ञों का कहना है कि भारत में वनभैंसों की शुद्ध नस्ल अब केवल असम और छत्तीसगढ़ में ही बची हुई है।

वन विभाग के दस्तावेज़ों के अनुसार छत्तीसगढ़ का उदंती सीतानदी टाइगर रिज़र्व वनभैंसों का प्राकृतिक रहवास रहा है। दस्तावेज बताते हैं कि पहले यह पूरा जंगल बिंद्रानवागढ़ ज़मींदारी में था, जहां 25 रुपये का शुल्क दे कर कोई भी शिकार कर सकता था। 27.08.1935 को अधिसूचना क्रमांक 1905-1517-4 जारी कर सरकार ने वनभैंसों के शिकार पर रोक लगा दी। लेकिन इस ज़मींदारी में शिकारियों को एक गौर, एक बारहसिंघा, दो हिरण और एक सांभर के शिकार की अनुमति थी।

जमींदारी प्रथा के अंत के बाद 19.08.1953 को अधिसूचना क्रमांक 788-2319 जारी कर शिकार के नियमों में बदलाव लाया गया। इसके तहत सरकार की अनुमति से वनभैंसों का शिकार किया जा सकता था लेकिन गौर के शिकार की अनुमति नहीं थी। 1955 के शिकार नियमों में निर्धारित शुल्क जमा कर, गौर, जंगली भैंस, बारहसिंघा, बाघ, सांभर, तेंदुआ, भालू और चीतल का शिकार किया जा सकता था। लेकिन 11.11.1971 के अधिसूचना क्रमांक 6036-10 (2) 71 जारी कर के शिकार पर रोक लगा दी गई। लेकिन तब तक शायद देर हो चुकी थी।

वन विभाग ने अविभाजित मध्य प्रदेश में इस पूरे इलाके में 1986-87 में 240 वनभैंसों की उपस्थिति का दावा किया था। लेकिन साल भर बाद, 1988 में स्वतंत्र वन्यजीव विशेषज्ञों ने कहा कि राज्य में केवल 104 वनभैंसे हैं। नवंबर 2000 में छत्तीसगढ़ अलग राज्य बनने और वनभैंस को राजकीय पशु का दर्ज़ा दिए जाने के बाद यह संख्या और घटती चली गई और 2004 तक पूरे मध्य भारत में वनभैंसों की कुल संख्या 70 से भी कम रह गई।

उदंती सीतानदी टाइगर रिज़र्व और इंद्रावती टाइगर रिज़र्व के इलाकों में वनभैंसों की उपस्थिति के दावे के बीच यहां वनभैंसों की गणना का फैसला लिया गया। माओवादी गतिविधियों के कारण इंद्रावती में तो वनभैंसों का सर्वेक्षण करने से वन विभाग बचता रहा लेकिन उदंती-सीतानदी में 2007 में जब वन भैंसों का सर्वेक्षण किया गया तो वहां कुल जमा सात वन भैंसे मिले, जिसमें केवल एक मादा थी।

इसके बाद आनन-फानन में राज्य सरकार ने वनभैंसों के संरक्षण और संवर्धन के लिए एक टास्क फोर्स का निर्माण किया और वाइल्ड लाइफ़ ट्रस्ट ऑफ इंडिया के साथ मिल कर वनभैंसों को बचाने का अभियान शुरु किया गया। दिलचस्प ये है कि इस पूरी योजना में भारत सरकार के किसी भी उपक्रम, कोशिकीय एवं आणविक जीवविज्ञान केन्द्र, भारतीय वन्यजीव संस्थान, भारतीय पशु-चिकित्सा अनुसंधान संस्थान आदि की सेवाएं कभी नहीं ली गईं। वनभैंसों के संरक्षण का पूरा काम, वाइल्ड लाइफ़ ट्रस्ट ऑफ इंडिया को सौंप कर वन विभाग निश्चित हो गया।

क्लोन वनभैंस का भी कोई लाभ नहीं

एक तरफ़ वनभैंसों को रेडियो कॉलर लगाए गये, वहीं दूसरी ओर कुछ वनभैंसों को संरक्षित करने की योजना बनाई गई। वनभैंसों की आबादी बढ़ाने के लिए उदंती सीतानदी टाइगर रिज़र्व के एक हिस्से में एक विशालकाय बाड़े का निर्माण किया गया और बचे हुए वनभैंसों को इसी बाड़े में रखा गया। लेकिन यहां भी वन विभाग को निराशा हासिल हुई क्योंकि प्राकृतिक रहवास के बजाये कृत्रिम तरीके से बाड़े में रखे गये मादा वनभैंसों ने हमेशा नर भैंसे को ही जन्म दिया।

जैसे आशा नामक मादा वनभैंसा को 2005 में सीतानदी उदंती के एक बाड़े में रखा गया था और इस दौरान आशा ने 6 नर और खुशी नामक एक मादा वनभैंसे को जन्म दिया। पिछले साल 18 फरवरी को एकमात्र प्रजनन योग्य मादा वनभैंस, आशा की मौत के बाद वनभैंस प्रजनन की कोशिशों पर लगाम लग गया। इस बीच सबकी उम्मीदें आशा की कथित क्लोन दीपाशा पर टिक गईं।

सरकार का दावा है कि सीतानदी उदंती के बाड़े में रखी गई आशा के कान के एक टुकड़े से करनाल स्थित राष्ट्रीय डेयरी अनुसंधान संस्थान में 12 दिसंबर 2014 को दीपाशा नामक क्लोन मादा वनभैंस का जन्म हुआ।

हालांकि इस क्लोन को लेकर भी सवाल हैं क्योंकि इस क्लोन का रुप रंग पूरी तरह से पालतू मुर्रा भैंस की तरह है। इसके वनभैंस के क्लोन होने पर भी संदेह है। हालत ये है कि इस कथित वन भैंस का क्लोन तैयार करने वाले करनाल स्थित नेशनल डेयरी रिसर्च इंस्टिट्यूट के प्रमुख वैज्ञानिक और एनिमल बॉयोटेक्नोलॉजी सेंटर के प्रमुख डॉ. प्रभात पाल्टा ने 2018 में इन पंक्तियों के लेखक से लिखित सवाल जवाब में स्वीकार किया था कि उनकी संस्था ने क्लोन वनभैंस के ‘जेनेटिक मेकअप’ पर विस्तृत अध्ययन नहीं किया है।

डॉक्टर पाल्टा के अनुसार, ‘माइक्रोसेटेलाइट मार्कर्स का उपयोग करके क्लोन जंगली भैंस के बछड़े के पितृत्व की पुष्टि की गई। हालांकि, माइक्रोसेटेलाइट मार्कर्स घरेलू भैंस के हैं क्योंकि जंगली भैंस के माइक्रोसेटेलाइट मार्कर्स पर कोई जानकारी उपलब्ध नहीं है।’

बहरहाल दुनिया में इस पहले कथित वन्यजीव के क्लोन पर एक करोड़ रुपये से अधिक खर्च हुआ। 2018 में इस क्लोन को रायपुर लाया गया, जिसके लिए ढाई करोड़ रुपये की लागत से रायपुर के नंदनवन जंगल सफारी में एक बाड़े का निर्माण किया गया। लेकिन इसके बाद वनभैंस के वंश वृद्धि का मामला फाइलों में क़ैद हो कर रह गया।

नंदनवन जंगल सफारी की डीएफओ एम मर्सीबेला का कहना है कि केंद्रीय चिड़ियाघर प्राधिकरण ने प्राकृतिक रुप से गर्भाधान के लिए हैदराबाद के कोशिकीय एवं आणविक जीवविज्ञान केन्द्र, देहरादून स्थित भारतीय वन्यजीव संस्थान, करनाल के राष्ट्रीय डेयरी अनुसंधान संस्थान और बरेली के भारतीय पशु-चिकित्सा अनुसंधान संस्थान से संपर्क कर उनकी राय ली थी। लेकिन इन संस्थानों की राय के बाद केंद्रीय चिड़ियाघर प्राधिकरण ने इस क्लोन के साथ, किसी नर वनभैंसे के संसर्ग को अनुमति प्रदान नहीं की।

एम मर्सीबेला ने कहा, ‘हैदराबाद के कोशिकीय एवं आणविक जीवविज्ञान केन्द्र ने कृत्रिम गर्भाधान के लिए हमें जो प्रस्ताव दिया, वह बेहद खर्चीला है। इसलिए इस मामले में आगे कोई कार्रवाई नहीं हो सकी है।’

असम से आयात

तमाम कोशिशों के बाद भी जब 15 सालों में राज्य में वन भैंसों की संख्या में अपेक्षित वृद्धि नहीं हुई तो राज्य के इंद्रावती टाइगर रिज़र्व में देखे गये वनभैंसों को ला कर वंशवृद्धि की चर्चा शुरु हुई लेकिन यह बात आगे नहीं बढ़ पाई और इसे अज्ञात कारणों से बंद करके वन विभाग ने असम से वनभैसों के आयात की योजना बनाई।

इसके लिए पहले असम के वनभैंसों जेनेटिक अध्ययन किया गया। केंद्र और असम सरकार की औपचारिक सहमति के बाद पिछले साल अप्रैल में, 1900 किलोमीटर दूर, असम के मानस राष्ट्रीय उद्यान से एक नर और एक मादा वनभैंस को छत्तीसगढ़ लाया गया। इन्हें बारनवापारा अभयारण्य में रखा गया है। इन वनभैसों को छत्तीसगढ़ लाये साल भर से अधिक हो चुके हैं लेकिन असम से लाये गये वनभैंसों की प्रजनन संबंधी कोई कोशिश ही नहीं की गई है।

बारनवापारा अभयारण्य के डीएफओ कृष्णाराम बढ़ई ने कहा, ‘असम से पांच नर और एक मादा वनभैंसे को लाने की योजना थी। पिछले साल हम दो वनभैंसों को ला पाए थे। लेकिन ये अभी बच्चे हैं, इसलिए इनके प्रजनन के बारे में तो सोचा ही नहीं जा सकता। अभी इसमें थोड़ा समय लगेगा।’

छत्तीसगढ़ में वन्यजीव बोर्ड की सदस्य नेहा सैमुअल का कहना है कि राजकीय पशु को लेकर एक स्पष्ट रणनीति ज़रुरी है। अब तक इसके संरक्षण के लिए क्या किया गया और क्या किया जाना है, यह कार्ययोजना ज़रुरी है। उन्होंने कहा, ‘राज्य के इंद्रावती टाइगर रिज़र्व में भी वनभैसों के समय-समय पर देखे जाने की ख़बर है। असम से वनभैंसों को लाने के बजाये, इंद्रावती के वनभैंसों को संरक्षित करने की कोशिश की जाये तो यह बेहतर होगा। इसके अलावा ओडिशा और महाराष्ट्र के साथ मिल कर भी एक साझा कार्ययोजना का निर्माण किया जा सकता है।’

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