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आर्यन खान / प्यादों पर बहस? बादशाह, कहां है? आज तक, खैर-खबर नहीं!

चित्र : आर्यन खान, ड्रग्स मामले में न्यायालय परिसर से कोर्ट रूम जाते हुए।

इन दिनों, भारतीय मीडिया में सबसे ज्यादा चर्चा का विषय है वो है शाहरुख खान के बड़े बेटे आर्यन खान, वो ड्रग्स मामले में कानून के गिरफ्त में है। उन्हें जेल होगी या बेल ये वक्त बताएगा। यहां हम बात ड्रग्स की करें तो यह मुंबई ही नहीं भारत में नया नहीं है। यह सदियों से है, लेकिन हर बार उनको गिरफ्त में लिया जाता रहा है जो इसका उपयोग कर रहे हैं सप्लायर और बनाने वाले पर्दे के पीछे अपने इस कारोबार को आगे ले जा रहे हैं।

ऐसे कई मामले हैं, जैसे हालही में यह खबर ‘आया राम, गया राम’ हो गई कि गुजरात के मुंद्रा बंदरगाह पर करीब 3000 किलोग्राम हेरोइन बरामद हुई तो इस बारे में ज्यादा बात नहीं की गई। यह पोर्ट अडानी का है। राजस्व खुफिया निदेशालय (डीआरआई) ने गुजरात के कच्छ जिले में मुंद्रा बंदरगाह से 2,988.21 किलोग्राम हेरोइन जब्त की है, जिसकी कीमत 15000 करोड़ रुपए है। हालांकि कुछ विदेशी और भारतीय लोगों की गिरफ्तारी हुई हैं।

‘ड्रग्स के खिलाफ जंग’ दुनियाभर में एक बड़ा मुद्दा है जिसमें भारत सहित कई देश इस समस्या का समाधान करने में जुटे हैं, लेकिन ऐसे कई मामले भी सामने आ रहे हैं जहां नारकोटिक्स विभाग के अफसर निशाने पर रहते हैं। मामला यदि आर्यन केस को लेकर करें तो जांच अधिकारी ही कटघरे में नजर आते हैं।

यहां कौन सही है, कौन गलत यह निर्णय केवल न्यायालय और समय करेगा लेकिन भारत में मीडिया और राजनीतिक पार्टियों के गठबंधन से जो प्रोपेगंडा चलाया जा रहा है इसमें हानि ही होती है। जो लोग यह मान रहे हैं आर्यन ने जो किया उसकी सजा उसे मिलनी चाहिए तो भविष्य में हो सकता है कि अगला नम्बर उसी व्यक्ति के परिजन का हो? मैं ऐसा इसलिए कह रहा हूं क्योंकि हम जिस तरह ड्रग्स सेवन या ड्रग्स की चर्चा करने वाले लोगों पर कार्रवाई करते हैं, लेकिन 80 के दशक के कुछ समय पहले से फलता-फूलता यह व्यापार की मूल को अभी तक नष्ट नहीं किया जा सका।

साल 1985 की बात है उस समय लागू किए गए ‘नार्कोटिक्स ड्रग्स ऐंड साइकोट्रोपिक सब्स्टेंसेज एक्ट’ (एनडीपीएस) नामक कानून इतना विचित्र, कठोर, अव्यावहारिक, निष्प्रभावी, शोषणकारी, और दुरुपयोग किया जाने वाला कानून है। दूसरे शब्दों में कहें तो इसे दिखावे के लिए बनाया गया था और पिछले चार दशक में इसमें कई बदलाव किए गए, इसे कमजोर किया गया फिर भी यह नागरिकों के लिए आफत है और सुर्खियों बटोरने की चाह रखने वाले व भ्रष्ट पुलिसवालों के लिए एक वरदान, वकीलों के लिए लॉटरी, और जजों के लिए सिरदर्द बना हुआ है।

अब समय से थोड़ा और पीछ जाएं तो 1960 के दशक में जब मनोविकृति, हिप्पिवाद, नशाखोरी पश्चिम के विरक्त युवाओं का, खासकर वियतनाम युद्ध के कारण बन गई तब यह दौर जब अपने उत्कर्ष पर था तब बीटल्स ने ‘लूसी इन द स्काइ विद डायमंड्स’ गाना रचा था, जिसे ‘एलएसडी’ के रूप में लिया गया जो उस समय सबसे महंगा, चहेता और अवैध ड्रग था जिसका इस्तेमाल होश उड़ाने के लिए किया जाता था। जब गाने की रचना करने वाले लेनन को पकड़ लिया गया, तब बाद में उन्होंने यह समझाने की नाकाम कोशिश की कि उन्होंने तो ‘एलिस इन वंडरलैंड’ से प्रेरणा ली है।

तथ्य यह है कि 1950 के दशक के मध्य से 1970 के दशक तक ड्रग्स को मानवता का सबसे बड़ा दुश्मन माना जाता था। 1961 में पेरिस में तमाम देशों की बैठक हुई जिसे नार्कोटिक्स ड्रग्स का ‘सिंगल कन्वेन्शन’ नाम दिया गया और जुलाई में एक समझौते को मंजूर किया कि इस पर दस्तखत करने वाला हर एक देश अपने यहां इतना कठोर कानून बनाएगा कि ड्रग्स का खतरा 25 वर्षों में खत्म हो जाए, आखिर में भारत ने 1985 में एनडीपीएस एक्ट बनाया। लेकिन ऐसा आज तक नहीं हुआ।

तब तक अमेरिका में रिपब्लिकन सत्ता में वापस आ गए. रिचर्ड निक्सन के लिए वियतनाम युद्ध के दौरान और युद्ध विरोधी आंदोलन के दौरान ड्रग्स के खिलाफ जंग जिहाद के बराबर थी. रोनाल्ड रीगन ने उस कड़ी को आगे बढ़ाया. भारत में नये प्रधानमंत्री बने राजीव गांधी उनकी और अमेरिका की तरफ हाथ बढ़ा रहे थे।

वरिष्ठ पत्रकार शेखर गुप्ता अपने एक लेख में लिखते हैं, ‘रूढ़िवादी प्योरिटिनिज़म, भू-राजनीति, और सामंती पारिवारिक संबंधों के नशीले मेल में उलझा एक मामला आदिल शहरयार का था, जिसे एक बड़े जुर्म, धोखाधड़ी, और एक पोत में विस्फोटक रखने के मामले में यूएस में जेल में बंद कर दिया गया था और गांधी परिवार उसे रिहा करवाना चाहता था। संदिग्ध सौदेबाजी की अफवाहें दिल्ली के लुटिएन्स इलाके की हवा में तैर रही थीं। शहरयार इस परिवार के करीबी, वफादार मोहम्मद यूनुस का बेटा था। इस कहानी को विस्तार से वही बता सकता है जिसने उस दौर को करीब से देखा होगा, लेकिन उस दौर ने एक ऐसा दानवी कानून दिया जिसने न केवल आरोपी पर यह जिम्मेदारी डाल दी कि वह खुद को बेकसूर साबित करे बल्कि भारी मात्रा में ड्रग्स रखने वाले के लिए मौत की सजा अनिवार्य बना दी (जैसा कि सिंगापुर या ईरान में लागू है) और जज के लिए कोई विकल्प नहीं छोड़ा। निक्सन वियतनाम में भले हार गए लेकिन उनका प्रेत ड्रग्स के खिलाफ जंग जीत रहा था

भारत में कानून और न्याय की प्रक्रिया से जुड़े हर किसी को मालूम है कि एक भयंकर भूल हो गई है, लेकिन इस पर सवाल कौन उठाए?

विधि लीगल नाम के एक थिंक टैंक की कानूनविद नेहा सिंहल मीडिया में लिखे एक लेख में बताती हैं कि साल 2018 में भारत में एनडीपीएस कानून के तहत 81,778 लोगों पर आरोप दर्ज किए गए, जिनमें 99.9 प्रतिशत लोगों पर ड्रग्स का निजी उपभोग करने का आरोप लगाया गया था। इसके साथ ही केंद्रीय सामाजिक न्याय एवं सशक्तीकरण मंत्रालय की 2019 की रिपोर्ट भारत में मादक द्रव्यों के दुरुपयोग का परिमाण को भी देखें। कहा गया कि उस दौरान भारत में भांग का इस्तेमाल 3 करोड़ लोग कर रहे थे। अगर इन सब पर एनडीपीएस कानून लागू कर दिया गया तो हिसाब लगाएं कि कितनी जेलें बनानी पड़ेंगी। इसके अलावा 60 लाख लोग ओपीओड लत के शिकार थे। कड़े ड्रग्स लेने वालों की संख्या 8.5 लाख थी।

देश में 3000 किग्रा ड्रग्स (हेरोइन) पकड़ी गई उस पर चुप्पी है और 6 ग्राम चरस पर हंगामा। यह ठीक उसी तरह है जैसे हमने मच्छर को मारने के लिए बंदूक का इस्तेमाल कर डाला और बंदूक भी उन्हें थमा दी जिन्हें इसका गलत इस्तेमाल करने की आदत है।

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