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हरियाणा / सरकार की लापरवाही से ‘भू-जल का गिरता स्तर’

प्रतीकात्मक चित्र।

  • विवेक गुप्ता।

हरियाणा में भू-जल निकासी की क्षमता से 137 फीसदी अधिक निकाला जा रहा है। इस राज्य के 141 प्रखंडों में से 85 प्रखंड लाल श्रेणी में पहुंच गए हैं। इन क्षेत्रों में भू-जल संकट गंभीर होता जा रहा है। यहां भूजल निकासी की सबसे बड़ी वजह धान की खेती है। धान की खेती में पानी की खपत अधिक होती है।

हरियाणा सरकार इस संकट से निपटने के लिए धान की खेती का रकबा कम करने की कोशिश में है। सरकार ने धान के रकबे को दो लाख एकड़ तक कम करने का लक्ष्य रखा है। हालांकि यह लक्ष्य हासिल करना आसान नहीं है।

भू-जल के खपत के मामले में भारत, विश्व के शीर्ष देशों में आता है। यहां 80 फीसदी से अधिक घरेलू जल आपूर्ति, भू-जल से ही होती है। हर साल देश के अलग-अलग हिस्सों से भूजल स्तर के गिरने की खबर आती रहती है। हरियाणा भी इस तरह की खबरों से अछूता नहीं है। इस समस्या को लेकर राज्य में जल संसाधन के संरक्षण, प्रबंधन और विनियमन के लिए गठित एक कमेटी ने जुलाई 2021 की शुरुआत में अपनी पहली बैठक की।

केंद्रीय भू-जल प्राधिकरण के ताजा आंकड़े बैठक के दौरान पेश किए गए। इसमें खुलासा हुआ कि हरियाणा के कुल 141 ब्लॉकों में से 85 ब्लॉक भू-जल दोहन के कारण रेड कैटेगरी में पहुंच गए हैं। यह 85 ब्लॉक राज्य के भौगोलिक क्षेत्र के 60 फीसदी हिस्से को दर्शाते हैं। इस कमेटी के आंकड़ों से ही पता चलता है कि वर्ष 2004 में 55 ब्लॉक रेड कैटेगरी में थे। यानी डेढ़ दशक में 30 और ब्लॉक इसमें जुड़ गए हैं।

हरियाणा जल संसाधन प्राधिकरण की अध्यक्ष केशनी आनंद ने बताया कि हरियाणा के 22 में से 14 जिलों में जलस्तर में गिरावट चिंता का विषय है। अंबाला, कुरुक्षेत्र, जींद, करनाल और पानीपत सबसे ज्यादा प्रभावित हैं, उन्होंने कहा कि मुख्य रूप से धान की फसलों के कारण खेती के लिए अधिक मात्रा में पानी की आवश्यकता होती है। यह भूजल के गिरते स्तर की बड़ी वजह है।

आनंद ने कहा कि एक ब्लॉक को लाल श्रेणी में तब शामिल किया जाता है, जब भूजल की निकासी उसके रिचार्ज होने की रफ्तार से अधिक हो। इससे भूजल का स्तर नीचे चला जाता है जिसकी भारपाई नहीं हो पाती है। हरियाणा सरकार के आंकड़ों के अनुसार, वर्षा जल और नहर के पानी से वार्षिक भूजल रिचार्ज 10.15 बिलियन क्यूबिक मीटर (बीसीएम) है, जिसमें से 9.13 बीसीएम का उपयोग किया जा सकता है। लेकिन राज्य में वर्तमान वार्षिक भूजल निकासी 12.50 बीसीएम है। भूजल रिचार्ज के मुकाबले कहीं ज्यादे।

सरकारी आंकड़ों की मानें तो इसमें से 11.53 बीसीएम अकेले सिंचाई के लिए उपयोग किया जाता है और शेष घरेलू (0.63 बीसीएम) और औद्योगिक उपयोग (0.34 बीसीएम) के लिए जाता है। राज्य के आधे से अधिक क्षेत्र में, प्रत्येक वर्ष रिचार्ज की तुलना में अधिक भूजल निकाला जाता है, जिसके परिणामस्वरूप भूजल तालिका या ग्राउंडवाटर ग्राफ में निरंतर कमी आती है।

हरियाणा में भूजल निकालने की क्षमता से 137 प्रतिशत अधिक निकाला जाता है। यह देश के औसत से काफी अधिक है। भारत के भूजल निकासी का औसत 63 फीसदी है। पंजाब भी हरियाणा जैसी चुनौती झेल रहा है। पंजाब में भी हरियाणा की तरह गेहूं-धान की फसल बहुतायत में उगाई जाती है। पंजाब में भूजल दोहन की क्षमता से अधिक निकासी होती है। करीब 165 फीसदी।

भूजल स्तर और खतरे की घंटी 

भू-जल की दो श्रेणियां हैं, एक जो गतिशील है और दूसरी स्थिर है और जमीन के काफी नीचे है। आनंद ने कहा कि कुरुक्षेत्र जैसे जिलों में लोगों ने स्थिर भूजल का उपयोग करना शुरू कर दिया है। यह गंभीर परिस्थिति की तरफ इशारा है। रोहतक, झज्जर आदि क्षेत्रों में उच्च भूजल स्तर ने जल भराव की समस्या पैदा कर दी है, क्योंकि उन क्षेत्रों में भूजल खारा है। इसे सिंचाई के लिए उपयोग नहीं किया जा सकता है। उन क्षेत्रों में किसान ज्यादातर सिंचाई के लिए नहर के पानी पर निर्भर हैं।

वह कहती हैं, ‘हम अब ऐसी स्थिति में पहुंच चुके हैं जहां हमें पानी का उपयोग काफी सोच समझकर करना होगा। इसके लिए सिंचाई के छोटे उपक्रम और फसल में विविधता लाकर भूजल के उपयोग को युक्तिसंगत बनाने की आवश्यकता है। भूजल स्तर और न गिरे इसके लिए रिचार्ज के स्थानों को बढ़ाने की जरूरत है। इसके लिए नहरों की खुदाई एक उपाय हो सकता है, जिसपर अमल करने की सख्त जरूरत है।’

उनकी टीम महत्वपूर्ण क्षेत्रों में धान की फसलों को कम करने और साथ ही ड्रिप सिंचाई जैसी पानी बचाने वाली तकनीकों का उपयोग करने पर विचार कर रही है। आसपास कुछ क्षेत्रों में सफल प्रयोग किए गए हैं। धान की सीधी बुवाई ड्रिप सिंचाई अधिक कारगर हो रही है। धान की रोपाई की तुलना में। इसके साथ ही हरियाणा ने उचित जल ऑडिट भी शुरू कर दिया है। इसके लिए भूजल तालिका की रियल टाइम मॉनीटरिंग के लिए महत्वपूर्ण रेड ब्लॉक में 1,700 पीजोमीटर लगाए जा रहे हैं।

राज्य में नई योजना ‘मेरा पानी मेरी विरासत’ के माध्यम से किसानों को धान से मक्का और बाजरा जैसी फसलों की ओर बढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है। हम राज्य में लोगों को पाइपलाइन के जरिए साफ पानी भेजने की कोशिश कर रहे हैं। इसके लिए बड़े मूलभूत ढांचे की जरूरत होगी। केशनी आनंद कहती हैं, ‘हम सभी को यह महसूस करने की जरूरत है कि हमारा पानी कम हो रहा है और अगर तत्काल सुधार के उपाय नहीं किये गए तो आने वाली पीढ़ी को बहुत नुकसान होगा।’

धान की खेती का बढ़ता रकबा

हरियाणा में धान का रकबा 1996 में 8.5 लाख हेक्टेयर से बढ़कर 2018 में 13.87 लाख हेक्टेयर हो गया। हालांकि बीते साल धान की खेती का रकबा घटा है। यह 2020-21 में घटकर 12 लाख हेक्टेयर हो गया। यह वृद्धि मुख्य रूप से राज्य में बेहतर एमएसपी-आधारित खरीद प्रणाली के कारण हुई थी। इसी तरह की व्यवस्था पंजाब में भी है जहां अन्य राज्यों के विपरीत, सरकारी एजेंसियों द्वारा किसानों की पूरी उपज न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) पर खरीदी जाती है।

कृषि और किसान कल्याण की अतिरिक्त मुख्य सचिव सुमिता मिश्रा ने बताया कि इस साल उन्होंने धान के क्षेत्र को 2 लाख एकड़ (लगभग 80,000 हेक्टेयर) कम करने का लक्ष्य रखा है। यह चुनौतीपूर्ण है पर हम पूरी कोशिश कर रहे हैं। सरकारी योजना किसानों को धान से दूसरी फसलों की ओर मोड़ने के लिए प्रोत्साहित कर रही है।

‘मेरा पानी मेरी विरासत योजना’ के तहत, हरियाणा राज्य सरकार धान की खेती की बजाय मक्का, अरहर, उड़द, ज्वार, कपास, बाजरा, तिल आदि जैसी अन्य फसलों की तरफ प्रोत्साहित कर रही है। इसके लिए किसानों को प्रति एकड़ 7,000 रुपये का वित्तीय प्रोत्साहन भी दिया जा रहा है। पिछले साल राज्य ने धान की 97,000 एकड़ जमीन को अन्य फसलों की ओर सफलतापूर्वक मोड़ा है।

हालांकि, विशेषज्ञों का मानना ​​है कि किसान तब तक दूसरी फसलों की ओर नहीं बढ़ेंगे, जब तक कि उन्हें उसमें मुनाफा नहीं दिखता। कृषि आर्थिक विशेषज्ञ केसर सिंह बांगू का कहना है, ‘अगर राज्य चाहते हैं कि किसान मक्का या बाजरा की ओर रुख करें, तो उन्हें यह सुनिश्चित करना होगा कि इस उपज को खरीदें। सरकार को इसके लिए एक तंत्र विकसित करना होगा। जब तक ऐसा नहीं होता है, धान के क्षेत्र को कम करना मुश्किल है।’

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