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बकस्वाहा / हीरा खनन बना कारण, दांव पर है बुंदेलखंड का ये जंगल

बकस्वाहा के इमलीघाट इलाके में यह प्राकृतिक नाला बहता है। इसके ऊपर बांध बनाकर इसके पानी का उपयोग खदान में किया जाएगा। तस्वीर- अमन तिवारी

मनीष चंद्र मिश्रा।

  • मध्य प्रदेश के पन्ना के बाद अब पड़ोसी जिले छतरपुर में हीरे का सबसे बड़ा खदान बनाने की तैयारी हो रही है। इससे बुंदेलखंड क्षेत्र में स्थित बकस्वाहा जंगल का 364 हेक्टेयर इलाका प्रभावित होगा।
  • पानी को तरसते बुंदेलखंड में इस प्रोजेक्ट के तहत दो लाख से अधिक पेड़ काटे जाएंगे। पर्यावरण पर होने वाले दुष्प्रभावों को देखते हुए सोशल मीडिया पर इस परियोजना का विरोध होना शुरू हो गया है।
  • हीरा खनन की यह परियोजना लंबे समय से विवादित रही है। इससे पहले ऑस्ट्रेलिया की खनन कंपनी रियो टिंटो ने यहां खनन की संभावना तलाशी थी। उस वक्त भी पेड़ काटने का कड़ा विरोध हुआ था। अंततः कंपनी ने 2017 में परियोजना छोड़ने का फैसला लिया था।
  • फिलहाल यहां खनन का लीज आदित्य बिड़ला ग्रुप कंपनी के एस्सेल माइनिंग एंड इंडस्ट्रीज लिमिटेड को मिला है। कंपनी के मुताबिक इस स्थान पर 3.4 करोड़ कैरेट हीरा मिल सकता है।

मध्यप्रदेश के छतरपुर जिले का बकस्वाहा जंगल चर्चा में है। इसकी वजह है इस जंगल की कोख में दबा करोड़ों कैरेट हीरा और इसके खनन का हो रहा विरोध। हीरा खनन के लिए मशहूर पन्ना जिले से सटे इस जंगल में तकरीबन दो दशक से हीरा तलाशने की कोशिश हो रही है। हीरा निकालने के लिए बकस्वाहा जंगल स्थित बंदर डायमंड ब्लॉक का लीज आदित्य बिड़ला ग्रुप कंपनी के एस्सेल माइनिंग एंड इंडस्ट्रीज लिमिटेड को मिला है।

इस लीज को पाने के लिए सरकारी क्षेत्र की खनन कंपनी नेशनल मिनरल डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन, अडानी समूह की कंपनी चेंदीपाड़ा कोलारी, वेदांता और  रूंगटा समूह ने भी बोली लगाई थी। करीब 2500 करोड़ रुपए लागत वाली इस परियोजना में बंदर डायमंड ब्लॉक के लिए जंगल के 364 हेक्टेयर जमीन पर लगी हरियाली को हटाकर यहां खनन और उससे संबंधित मशीनें लगाई जाएंगी। इसके अलावा प्रोजेक्ट के लिए 11.593 हेक्टेयर जमीन सड़क और 6.537 हेक्टेयर जमीन नाले पर बांध बनाने के लिए भी चाहिए। कंपनी के मुताबिक इस स्थान पर 3.4 करोड़ कैरेट हीरा मिलने का अनुमान है।

हालांकि स्थानीय लोगों को यह परियोजना रास नहीं आ रही है। हाल के दिनों में इस परियोजना को लेकर विरोध बढ़ा है। इसके विरोध में सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका भी लगाई गई है।

संकल्प जैन, इस परियोजना के खिलाफ चल रहे सोशल मीडिया अभियान में बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रहे हैं। जैन बकस्वाहा जंगल के पास बड़ा मलहरा निवासी हैं वह बताते हैं कि पर्यावरण प्रभाव का आंकलन कहता है कि इस स्थान पर दो लाख से अधिक पेड़ मौजूद हैं जिन्हें खनन के लिए काटा जाएगा। इसके अलावा जंगल में मौजूद प्राकृतिक नाले के पानी का उपयोग किया जाएगा। हम अपने इलाके में होने वाले इस भीषण पर्यावरणीय क्षति के खिलाफ हैं। हमारा इलाका बुंदेलखंड क्षेत्र में आता है जहां पानी की काफी किल्लत है।

संकल्प ने अपनी संस्था आगाज के माध्यम से उन हजारों लोगों में शामिल हैं जो ‘सेव बकस्वाहा  फॉरेस्ट’ को सोशल मीडिया के विभिन्न प्लेटफॉर्म पर ट्रेंड कराकर लोगों का ध्यान इस तरफ खींच रहे हैं। स्थानीय लोगों को इस परियोजना के शुरू होने के बाद आजीविका के संकट की चिंता है।

हीरा का खनन और आजीविका पर संकट का डर

भारत में आंध्र प्रदेश, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश तीन ऐसे राज्य हैं जहां हीरा खनन होता है। इनमें से मध्य प्रदेश में देश का 90 फीसदी हीरा उत्पादन होता है। इंडियन ब्यूरो ऑफ माइन्स की एक रिपोर्ट कहती है कि भारत में वर्ष 2018-19 में 38,437 कैरेट हीरा उत्पादन हुआ। इससे पहले 2017-18 में यह आंकड़ा 39,699 कैरेट का था। वहीं, विश्व में वर्ष 2018 में 1,498 लाख कैरेट हीरा का उत्पादन हुआ। इसी सिलसिले को आगे बढ़ाने के लिए छत्तरपुर जिले में भी खनन की कोशिशें तेज हैं। पर आस-पास के लोग डरे हुए हैं।  

कसेरा गांव बंदर डायमंड ब्लॉक का नजदीकी गांव है और यहां के लोग वनोपज संग्रह के लिए जंगल जाते हैं। कसेरा गांव के युवा अनिकेत दिखित बताते हैं कि कंपनी दावा करती है कि वह 400 लोगों को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष तौर पर रोजगार देगी। यह रोजगार जंगल में मौजूद महुआ के सैकड़ों पेड़ों को काटने के बाद मिलेगा। मेरे गांव और आसपास के हजारों लोग इन महुआ के पेड़ पर आश्रित हैं। जितना रोजगार मिलेगा उससे कहीं अधिक चला जाएगा।  

अनिकेत इस बात पर जोर देते हुए कहते हैं कि महुआ, तेंदूपत्ता जैसे वनोपज से ग्रामीणों की अच्छी आमदनी हो जाती है। हमारे परिवार में खेती का काम होता है। इस परियोजना में पानी की काफी खपत भी होनी है। हमें डर है कि पानी की कमी से जूझ रहा हमारा इलाका कहीं पूरी तरह न सूख जाए।

दशकों से विवाद में है यह परियोजना

यह पहली बार नहीं है जब हीरा खनन की इस परियोजना को कड़े  विरोध का सामना करना पड़ रहा है। वर्ष 2006 में मध्यप्रदेश सरकार ने ऑस्ट्रेलिया की कंपनी रियो टिंटो को इलाके के सर्वे करने का काम सौंपा था। उस समय भी इस परियोजना का खासा विरोध हुआ था। तकरीबन एक दशक तक इस परियोजना पर काम करने के बाद कंपनी ने अगस्त 2016 में खनन का काम शुरू नहीं करने का फैसला लिया और इसे मध्य प्रदेश सरकार को सौंप दिया। यह काफी चौंकाने वाला था। हालांकि, उस समय परियोजना का विरोध जनआंदोलन बन चुका था। लेकिन कंपनी ने खुद को अलग करने की कुछ और वजह बताई।

उन्होंने एक प्रेस रिलीज जारी करते हुए रियो टिंटों ने व्यापक समीक्षा करने के बाद बंदर डायमंड प्रोजेक्ट को भारत और मध्य प्रदेश सरकार को गिफ्ट करने का फैसला लिया है। कंपनी ने परियोजना संबंधित आखिरी रिपोर्ट वर्ष 2017 में सौंपी। रियो टिंटो के कॉपर और डायमंड्स विभाग के चीफ एग्जीक्यूटिव अरनौद सोइरातो ने कहा कि रियो टिंटो के इस कदम से हमारा व्यापार करना सरल होगा और हमें विश्व के दूसरे स्थानों पर मौजूद संपत्ति पर ध्यान देने का मौका मिलेगा।

हालांकि, रियो टिंटो के प्रेस रिलीज से उनके जाने की स्पष्ट वजह का पता नहीं चलता है। इसकी वजह जानने के लिए ऑस्ट्रेलिया और रूस के विश्वविद्यालयों से जुड़े दो विद्वानों ने भारत आकर एक अध्ययन के जरिए इसके पीछे के कारणों का पता लगाया।

कुंतला लहिरी दत्त, ऑस्ट्रेलियन नेशनल यूनिवर्सिटी से जुड़े रिसोर्स, एनवायरनमेंट और डेवलपमेंट प्रोग्राम के प्रोफेसर हैं। वह बताती हैं कि हमने अपने अध्ययन में पाया कि रियो टिंटो की वापसी की कोई एक वजह नहीं रही। विश्वभर में हीरे का कारोबार सिमटता देखकर कंपनी ने वापसी का फैसला किया होगा। इसके अलावा यह भी सामने आया कि अफ्रीकी देश और रूस में अधिक हीरा मिलने की संभावना है। बताया जा रहा है कि वैश्विक कारणों के अलावा स्थानीय कारणों को भी इस अध्ययन में शामिल किया गया है।

हायर स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स (एचएसई), मॉस्को में समाजशास्त्र के असिस्टेंट प्रोफेसर और अध्ययन के लेखक अर्नब चौधरी ने बताते हैं कि खदान के आसपास रहने वाले लोगों का विरोध भी एक वजह हो सकता है। कुछ गैर-लाभकारी और सामाजिक संस्थाओं ने पर्यावरण के नुकसान का हवाला देकर कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। कंपनी के सामने कानूनी पेचीदगी बढ़ती गई। इस दौरान उनसे अंडरग्राउंड खनन करने को कहा गया जो कि काफी खर्चीला साबित होने वाला था।

चौधरी ने अपने अध्ययन में पाया कि भारत का बदला राजनीतिक परिवेश भी इसके पीछे एक वजह है। वह बताते हैं कि वर्ष 2014 में केंद्र में भाजपा की सरकार आ गई। इसके बाद देश के ही औद्योगिक घरानों को तवज्जो मिलने लगी। रियो टिंटो के पास विश्व में कई स्थानों पर खदानें हैं। मुश्किलें बढ़ती देख कंपनी ने वापस जाना बेहतर समझा।

स्थानीय विरोध के बारे में बताते हुए जंगल के समीप स्थित कस्बा बड़ा मलहरा के निवासी और सामाजिक कार्यकर्ता हरिकृष्ण द्विवेदी बताते हैं कि हमने कंपनी के साथ जमीनी स्तर के साथ कोर्ट तक लड़ाई लड़ी। पेड़ों की कटाई रोकने के लिए हाई कोर्ट से हमें स्टे ऑर्डर भी मिल गया था। जमीनी स्तर पर ग्रामीणों को साथ लेकर कई प्रदर्शन हुए। तब जाकर हम पर्यावरण बचा पाए।

पर्यावरण की चिंताएं और मुखर होता विरोध

पिछली लड़ाई जीतने के बाद द्विवेदी के सामने एक बार फिर जंगल बचाने की चुनौती है। हरिकृष्ण बताते हैं कि रियो टिंटो के जाने के बाद एक बार फिर बुंदेलखंड की हरियाली को खतरा है। कंपनी का कहना है कि सिर्फ दो लाख से कुछ ज्यादा पेड़ कटने वाले हैं, लेकिन मेरा अनुभव कहता है कि पेड़ों की संख्या पांच लाख के करीब होगी। पिछली बार भी 11 लाख पेड़ कटने वाले थे। कोरोना वायरस महामारी के दौरान पहले जैसा आंदोलन मुश्किल है, लेकिन इस चुनौती को स्वीकार करना होगा।

बकस्वाहा का जंगल देश के बुंदेलखंड क्षेत्र में आता है जहां पानी की किल्लत रहती है। इस परियोजना में पानी की अत्यधिक खपत ने इलाके की चिंता बढ़ा दी है। प्री फिजिबिलिटी रिपोर्ट के मुताबिक परियोजना में 16,050 किलो लीटर प्रतिदिन के हिसाब से पानी की खपत होगी। इसकी पूर्ति पास में बह रहे एक प्राकृतिक नाले के पानी से की जाएगी। इसके लिए नाले पर बांध बनाया जाएगा। 

रिपोर्ट कहती है कि बांध की क्षमता 17 मिलियन क्यूबिक मीटर होगी जिसका उपयोग नाले में पानी कम होने की स्थिति में होगा। इतनी मात्रा में पानी का उपयोग चट्टानों के टुकड़ों को साफ करने में किया जाएगी ताकि उसमें हीरा खोजा जा सके। यह तब है जब सेंट्रल ग्राउंड वाटर ऑथोरिटी ने छतरपुर के बकस्वाहा तहसील को पानी के मामले में सेमी-क्रिटिकल श्रेणी में रखा हुआ है।

समूचा बुंदेलखंड पानी की कमी से जूझ रहा है। यह जंगल स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र के लिए आवश्यक है। लोगों को रोजगार देने के अलावा जंगल में अनेक पेड़-पौधे और जीव-जन्तु की मौजूदगी है। जंगल के नालों में बारिश का पानी इकट्ठा होता है जो हमारे खेती और भूजल रिचार्ज करने में सहायक है। यही जल धाराएं आगे चलकर बेतवा नदी में मिलती है जिससे बुंदेलखंड को पानी मिलता है।

फॉरेस्ट क्लीयरेंस की रिपोर्ट के मुताबिक खनन के लिए लीज पर दिए इलाके में 46 किस्म के पेड़ लगे हैं, जिनकी कुल संख्या 2,15,875 है। इसमें 7,106 महुआ, 36,652 तेंदू, 22,990 बेल और 37,334 सागौन के पेड़ लगे हैं। मध्य प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के एक सर्वे में स्पष्ट कहा गया है, “जंगल के आसपास जो लोग रहते हैं वह साल में दो से चार महीना आजीविका के लिए जंगल पर निर्भर हैं।”

“अन्य पेड़ों के साथ महुआ के पेड़ यहां बहुतायत हैं। इसके अलावा यहां वन्यजीव संरक्षण अधिनियम के शेड्यूल एक में शामिल कई जीव-जंतु रहते हैं। ये हैं चिंकारा, चौसिंगा, भालू, तेंदुआ, गोह (मॉनिटर लिजार्ड), गिद्ध और मोर,” यह जानकारी मध्य प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के इस जंगल को लेकर बनाए एक रिपोर्ट में मिलती है। जब हमने इस मुद्दे पर एस्सेल माइनिंग एंड इंडस्ट्रीज लिमिटेड का पक्ष जानने के लिए कंपनी से संपर्क करने की कोशिश की। उनकी तरफ से कोई जवाब नहीं आया है।

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