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कॉप – 26 / तो क्या अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन से सिर्फ उम्मीदें या ‘ग्लोबल वार्मिंग’ का समाधान?

सतपुड़ा थर्मल पावर प्लांट से निकलता कोयले का धुआं। तस्वीर– आशीष प्रजापति/विकिमीडिया कॉमन्स

  • सौम्य सरकार। ग्लासगो, स्काटलैंड ‘जलवायु परिवर्तन सम्मेलन कॉप- 26 से’ विशेष रिपोर्ट।

यदि ग्लासगो में शुरू हो रही संयुक्त राष्ट्र जलवायु शिखर सम्मेलन में, तमाम देशों के शीर्ष नेता, ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को कम करने के लिए अतिरिक्त प्रयास नहीं करते हैं, तो दुनिया कम से कम 2.7 डिग्री सेल्सियस तक गर्म हो जाएगी।

जलवायु संकट भारत के लिए विशेष रूप से चिंताजनक है क्योंकि देश के अधिकांश जिले ग्लोबल वार्मिंग से आने वाली बाढ़, सूखा और चक्रवात जैसी प्राकृतिक आपदाओं की चपेट में हैं। संपन्न देशों का, भारत जैसे विकासशील देशों को जलवायु आपातकाल को कम करने और इसके अनुसार खुद को ढालने के लिए जरूरी आर्थिक सहायता देने में, आनाकानी जारी है। रविवार, 31 नवंबर को शुरू हो रहे अंतराष्ट्रीय सम्मेलन में भाग लेने के लिए वार्ताकार और ऐक्टिविस्ट पहुंच रहे हैं जहां इन मुद्दों पर अच्छी खासी चर्चा होने वाली है। बता दें कि, ग्लासगो शिखर सम्मेलन को कॉप 26 के नाम से भी जाना जाता है।

जब संयुक्त राष्ट्र के प्रमुख कहते हैं कि हम भीषण जलवायु आपदा की तरफ तेजी से आगे बढ़ रहे हैं तो यह सबके लिए चिंता का विषय होना चाहिए। देखना यह होगा कि दुनिया के शीर्ष नेता इसे गंभीरता से लेकर भविष्य में जरूरी कदम उठाते हैं कि नहीं! यह 31 अक्टूबर को ग्लासगो में शुरू हो रहे दो सप्ताह की अंतरराष्ट्रीय वार्ता में स्पष्ट हो जाएगा।

शुरुआती संकेत उत्साहजनक नहीं हैं। वर्तमान में सभी देशों की जलवायु से संबंधित राष्ट्रीय स्तर की प्रतिबद्धताएं हैं। बावजूद इसके, इस सदी के अंत तक पृथ्वी के वैश्विक तापमान में 2.7 डिग्री सेल्सियस की औसत वृद्धि का अनुमान है। संयुक्त राष्ट्र ने इस सप्ताह जारी अपनी एक रिपोर्ट में इसका दावा किया।

इस रिपोर्ट में कहा गया है कि 30 सितंबर तक जितने भी देशों ने अपनी राष्ट्रीय योजनाओं को उजागर किया है या जिन्होंने नहीं किया है, इन सबको देखते हुए यह कहा जा सकता है कि 2100 तक पृथ्वी के तापमान में 2.7 डिग्री की वृद्धि लगभग तय है। जैसे चीन ने 2030 तक की अपनी योजनाएं नहीं उजागर की हैं। सनद रहे कि 2015 के ऐतिहासिक पेरिस समझौते के अंतर्गत सभी देशों को जलवायु परिवर्तन से निपटने के राष्ट्रीय प्रयासों की घोषणा करनी थी।

यदि पृथ्वी के तापमान में 2.7 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि होती है तो यह पेरिस समझौते के लक्ष्य से काफी अधिक होगा और इससे पृथ्वी की जलवायु में विनाशकारी परिवर्तन होंगे। पेरिस समझौते के लक्ष्य का अनुसार पृथ्वी के तापमान में हो रहे वृद्धि को 1.5 डिग्री सेल्सियस के भीतर ही रोकने की कोशिश करनी है। एमिशन गैप रिपोर्ट के 12वें संस्करण में कहा गया है, ‘इस सदी में ग्लोबल वार्मिंग को 1.5 डिग्री सेल्सियस से नीचे रखने के लिए, दुनिया को अगले आठ वर्षों में वार्षिक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को आधा करने की जरूरत है।’

भीषण जलवायु आपदा

संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने रिपोर्ट पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा, ‘हम भीषण जलवायु आपदा की तरफ तेजी से बढ़ रहे हैं। पिछली सारी घोषणाओं के बाद भी यह स्थिति है।’

विश्व मौसम विज्ञान संगठन ने सोमवार को अपने वार्षिक ग्रीनहाउस गैस बुलेटिन में बताया कि कोविड -19 महामारी के कारण आर्थिक मंदी का वातावरण बना। पर इससे वातावरण में ग्रीनहाउस गैसों की मात्रा में कोई कमी नहीं आई। पिछले साल यह रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया था। बुलेटिन में बताया गया है कि ग्लोबल-वार्मिंग की मुख्य वजह कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा 2020 में 413.2 भाग प्रति मिलियन (पीपीएम) थी। यह औद्योगिकरण के पूर्व के स्तर से लगभग 150% अधिक है।

पेटेरी तालस जो संयुक्त राष्ट्र मौसम एजेंसी के निदेशक हैं उनके अनुसार, ‘अभी मंजिल बहुत दूर है।” ग्रीनहाउस गैस की मात्रा में वृद्धि की वर्तमान दर से, इस सदी के अंत तक पृथ्वी का तापमान पेरिस समझौते के लक्ष्य (1.5 से 2 डिग्री सेल्सियस) से काफी अधिक हो जाएगा।’ पिछली बार पृथ्वी के वातावरण में कार्बन की इतनी मात्रा करीब 30 से 50 लाख वर्ष पहले देखी गयी थी। तब पृथ्वी का तापमान 2-3 डिग्री अधिक था और समुद्र का स्तर अब की तुलना में 10-20 मीटर अधिक था। “लेकिन तब 780 करोड़ लोग पृथ्वी पर निवास नहीं करते थे।

इंटर-गवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज ने अगस्त में एक वैज्ञानिक मूल्यांकन में कहा था कि ग्रीनहाउस गैसों की रिकॉर्ड स्तर यह बताता है कि उत्सर्जन को जल्द से जल्द कम किया जाए। पूर्व-औद्योगिक स्तरों की तुलना में ग्लोबल वार्मिंग को 1.5 डिग्री से कम रखने का प्रयास करने के लिए, कार्बन के उत्सर्जन को 2010 के स्तर से 45 प्रतिशत कम करना होगा। वह भी 2030 के पहले। इसमें अब महज नौ साल का समय बचा है। इसके बाद 2050 के आसपास कार्बन उत्सर्जन को लगभग शून्य तक ले जाना होगा, संयुक्त राष्ट्र समर्थित वैज्ञानिकों के एक समूह ने कहा था।

संयुक्त राष्ट्र के कई संगठन ने माना है कि कई देशों ने कार्बन उत्सर्जन को शून्य करने का लक्ष्य तो तय किया है। इससे ग्लोबल वार्मिंग को रोक जा सकता है। पर अमेरिका और चीन जैसे प्रमुख देशों ने जो घोषणा की है उसमें यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि कार्बन उत्सर्जन को शून्य कैसे किया जाएगा। नेट ज़ीरो (कार्बन उत्सर्जन को शून्य करना) का तात्पर्य हो रहे कार्बन उत्सर्जन को सोखना है। इसे कई तरह से किया जा सकता है, जैसे पेड़ लगाने और जमीन के सही इस्तेमाल करना इत्यादि।

ग्लासगो और भारत की चिंताएं

भारत और अफ्रीका के तमाम विकासशील देशों के लिए यह सब चिंताजनक हैं। ये वो देश हैं जिनके पास तेजी से गर्म हो रही दुनिया के प्रभावों को कम करने या उनके अनुकूल होने के लिए जरूरी साधन नहीं है। नई दिल्ली स्थित थिंक टैंक कौंसिल ओन एनर्जी, इनवायरनमेंट एण्ड वाटर (सीईईडब्ल्यू) द्वारा मंगलवार को जारी जलवायु संवेदनशीलता सूचकांक के अनुसार,  देश के 75 प्रतिशत से अधिक जिले, चरम मौसमी घटनाओं के केंद्र में हैं। यहां  63.8 करोड़ से अधिक लोग रहते हैं।

जर्मनी के बॉन स्थित एक गैर-लाभकारी संस्था जर्मन वॉच के अनुसार, 2020 में भारत सातवें नंबर पर था जहां जलवायु परिवर्तन संबंधित सबसे अधिक असर होने वाला है। सीईईडब्ल्यू के अध्ययन में भी इस बात को विस्तृत तौर पर बताया गया है। असम, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक और बिहार में जलवायु परिवर्तन का सबसे अधिक असर होने वाला है। इन राज्यों में बाढ़, सूखा, चक्रवात जैसी घटनाएं अधिक देखने को मिलेंगी।

इंडेक्स रिपोर्ट के प्रमुख लेखक अविनाश मोहंती ने कहा, ‘भारत में चरम जलवायु घटनाओं की आवृत्ति और तीव्रता में 2005 के बाद से लगभग 200 प्रतिशत की वृद्धि हुई है।’ ऐसे में ग्लासगो में हो रही वार्ता में भारत की क्या रणनीति होनी चाहिए? जलवायु वार्ताओं में भारत का ध्यान अब तक अमीर देशों पर इक्विटी और ऐतिहासिक जिम्मेदारी के आधार पर, उत्सर्जन में आक्रामक रूप से कटौती करने के साथ-साथ जलवायु कार्रवाई के लिए विकासशील देशों को पर्याप्त आर्थिक मदद के लिए दबाव बनाने का रहा है।

अंतरराष्ट्रीय संस्था, वर्ल्ड रिसोर्स सेंटर के जलवायु विभाग की निदेशक उलका केलकर बताती हैं, ‘खुद के विकास के अधिकार का भारत का सैद्धांतिक रुख अकाट्य है। यह भी कि प्राथमिक जिम्मेदारी ऐतिहासिक उत्सर्जकों के सर पर है, हालांकि, जलवायु परिवर्तन की वजह से देश का बहुत नुकसान होने वाला है और अगर हम विकास के लिए पर्यावरण के अनुकूल रास्ता इख्तियार करें तो बहुत कुछ हासिल भी किया जा सकता है।’

पैसा कहां है?

नागरिक समाज संगठनों के एक समूह, क्लाइमेट एक्शन नेटवर्क इंटरनेशनल के वरिष्ठ सलाहकार, हरजीत सिंह कहते हैं, ‘भारत ने मजबूती से सबको बताया है कि कैसे अमीर देश अपनी जिम्मेदारी निभाने में असफल रहे हैं। वो या तो मिटीगेशन संबंधित हो या वित्तीय सहायता देने में हो। पर भारत को अन्य विकासशील देशों के साथ भी काम करना चाहिए ताकि यह उजागर किया जा सके कि लोग पहले से ही विनाशकारी बाढ़, चक्रवात और बढ़ते समुद्र जैसे प्रभावों का सामना कर रहे हैं। जलवायु परिवर्तन के कारण हुई आपदाओं के प्रति अपनी संवेदनशीलता और नुकसान को उजागर करना चाहिए और अनुकूलन और क्षति के लिहाज से वित्तीय सहायता को बढ़ाने की मांग करनी चाहिए।’

समस्या का मूल यही है। विकासशील देशों के वार्ताकारों को इसका सामना करना ही होता है। अमीर राष्ट्र वर्तमान खेदजनक स्थिति के लिए अपनी ऐतिहासिक जिम्मेदारी को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हैं। ये देश, गरीब देशों को जलवायु परिवर्तन से लड़ने के लिए जरूरी वित्तीय सहायता देने में आनाकानी करते हैं।

2009 में दुनिया के विकसित देशों ने 2020 से हर साल 10,000 करोड़ डॉलर की वित्तीय सहायता देने पर सहमति प्रदान की थी। 2015 में हुए पेरिस समझौते के तहत भी इस सामूहिक लक्ष्य का सबने समर्थन किया। हालांकि, 25 अक्टूबर को जारी क्लाइमेट फाइनेंस डिलीवर प्लान में, इन देशों ने कहा है कि वे 2023 में ही वित्तीय सहायता देना शुरू करेंगे। यह तब है जब इन देशों के पास इस योजना को पूरा करने के लिए 12 साल का समय था।

हरजीत सिंह ने कहा, ‘यह स्पष्ट है कि अमीर देशों द्वारा इस 10,000 करोड़ डॉलर की मदद देने में न तो जरूरी प्रतिबद्धता दिखती है और न ही ईमानदारी। अपने आस-पास इतनी जलवायु आपदाओं का सामना करने के बावजूद भी ये अमीर देश यह नहीं समझ पा रहे हैं कि इस लड़ाई में महज अच्छे बोल बोलने से काम नहीं चलने वाला। जरूरी कदम भी उठाने पड़ेंगे।’

बड़ा उत्सर्जक और जलवायु परिवर्तन के प्रति अत्यधिक संवेदनशील होने के कारण भारत को सबसे अधिक नुकसान होने वाला है। खासकर तब जब दुनिया मजबूत मिटीगेशन लक्ष्यों के लिए सहमत नहीं होती है और जलवायु परिवर्तन से लड़ाई में वित्तीय सहयोग नहीं देती है। उलका केलकर ने बताती हैं, ‘यह समझ से पड़े है कि अपनी अर्थव्यवस्थाओं में खरबों डॉलर खर्च करने वाले अमीर देश जलवायु वित्त के लिए सालाना 10,000 करोड़ डॉलर क्यों नहीं जुटा पा रहे हैं।’

जलवायु आपदा से लड़ने के लिए खरबों की है जरूरत

विशेषज्ञ मानते हैं कि जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए खरबों डॉलर की जरूरत है। इस हिसाब से प्रति वर्ष 10,000 करोड़ डॉलर की वित्तीय सहायता कुछ भी नहीं है। लेकिन जब विकसित देशों ने इसकी घोषणा की तो लोगों ने ऐसे लिया कि चलो इनके इरादे तो नेक हैं। अब स्थिति बदल रही है। अब इन देशों के सामने सबसे बड़ी चुनौती है कि वे कुछ बड़े कदम उठाकर कमजोर देशों का भरोसा पुनः जीतें।

जलवायु शिखर सम्मेलन के अध्यक्ष और यूनिटेड किंगडम में संसद सदस्य आलोक शर्मा ने कहा, ‘हम लोगों को विकासशील देशों को वित्तीय सहायता देना ही चाहिए। मुझे पूरा भरोसा है कि कॉप 26 में अमीर देश इस मद में कई घोषणाएं करेंगे। जैसे गरीब देशों को आसान दर पर धन सुलभ करना इत्यादि।’

वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि जलवायु परिवर्तन को रोकने के लिए उत्सर्जन में भारी कटौती करना होगा। इसके लिए अब बहुत कम समय बचा है। अगर समय रहते ऐसा नहीं किया गया तो दुनिया को विनाशकारी आपदाओं का सामना करना पड़ेगा। कई समुदाय, विशेष रूप से विकासशील दुनिया में जिसमें भारत भी शामिल है, पहले से ही एक जलवायु परिवर्तन संबंधित घटनाओं का सामना कर रहे हैं। इन देशों में लोग बड़ी संख्या में विस्थापन या पलायन करने के लिए मजबूर हो रहे हैं।

संयुक्त राष्ट्र व्यापार और विकास सम्मेलन (युएनसीटीएडी) की गुरुवार को जारी एक रिपोर्ट के अनुसार, विकासशील देश पहले से ही जलवायु संबंधी आपदाओं के कारण अमीर देशों की तुलना में तीन गुना अधिक आर्थिक नुकसान झेल रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र व्यापार एजेंसी ने कहा कि निष्क्रियता के कारण विकासशील देशों के लिए अनुकूलन लागत पिछले एक दशक में दोगुनी हो गई है। तापमान में वृद्धि के साथ इस लागत में और वृद्धि होगी। 2030 में 30,000 करोड़ डॉलर और 2050 में 50,000 करोड़ डॉलर तक पहुंच जाएगी।

युएनसीटीएडी के अर्थशास्त्रियों ने कहा कि ग्लासगो में वित्तीय मदद देने पर जरूर बात होनी चाहिए। रिपोर्ट में कहा गया है कि विकासशील देशों को जलवायु परिवर्तन की लड़ाई में अधिक से अधिक वित्तीय सहायता मिल पाए इसके लिए अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय प्रणाली को सुधारा जाना चाहिए।

हरजीत सिंह ने कहा, ‘ग्लासगो शिखर सम्मेलन को यह सुनिश्चित करने की आवश्यकता है कि पिछड़े देशों को आर्थिक मदद प्रदान करने के लिए एक व्यवस्था बने। साथ ही यह भी कि उत्सर्जन में कमी के लिए लक्ष्य को और महत्वाकांक्षी बनाया जाए।’ उलका केलकर कहती हैं, ‘अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर बहुपक्षीय प्रक्रिया में विश्वास बनाए रखने के लिए इस कॉप में अच्छा परिणाम आना जरूरी है। यह जलवायु परिवर्तन जैसी वैश्विक आम समस्या के लिए बहुत महत्वपूर्ण है।’

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