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सद्भाव / देश में ‘धर्म के नाम पर’ माहौल खराब करने वालों को नसीहत!

प्रतीकात्मक चित्र।

  • वेदप्रताप वैदिक।

कुछ दिनों पहले, मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में एक सेंट्रल स्कूल के कैम्पस में बनी एक मस्जिद को लेकर विवाद हुआ था, विवाद की वजह स्कूल परिसर में नमान पढ़ना था, और विवाद को शुरू करने वाली भोपाल सांसद प्रज्ञा सिंह ठाकुर थीं। सांसद इस मामले को लेकर प्रिंसिपल को जिम्मेदार मान रही थीं, वहीं उस मस्जिद में पढ़ने वाले लोगों को दावा है कि यह मस्जिद 1966 से इस जगह पर है और वहां नमाज का सिलसिला उस वक्त से जारी था।

लेकिन हमारे देश में सद्भावना बनाए रखने के लिए कई लोग मौजूद हैं। गुड़गांव के सिखों ने मुसलमानों से कहा है कि वे हर शुक्रवार को गुरुद्वारों में आकर नमाज़ पढ़ा करें। उन्हें सड़कों पर यदि कुछ लोग नमाज़ नहीं पढ़ने देते हैं और उनके पास मस्जिदों का पूरा इंतजाम नहीं है तो वे चिंता न करें। गुड़गांव के पांच गुरुद्वारे अब नमाज के लिए भी खोल दिए जाएंगे। गुड़गांव और अन्य कई शहरों में इस बात को लेकर काफी विवाद उठ खड़ा हुआ है कि सड़कों पर नमाज़ और स्कूल परिसर में पढ़ने दी जाए या नहीं?

कुछ उग्र लोग उसका विरोध सिर्फ इसलिए कर रहे हैं कि वह मुसलमानों की नमाज़ है। उचित तो यह है कि सड़कों को रोकने वाली चाहे नमाज़ हो, चाहे रथ-यात्रा हो, किसान प्रदर्शन हो, पार्टियों के जुलूस हो या नेताओं की सभाएं हों, उन्हें नियंत्रित किया जाना चाहिए, क्योंकि सड़कों के रुक जाने से हजारों-लाखों लोगों के लिए तरह-तरह की मुसीबतें पैदा हो जाती हैं। गुड़गांव के हिंदुओं और मुसलमानों की तारीफ करनी पड़ेगी कि उन्होंने इस मुद्दे पर न तो कोई गाली-गुफ्ता किया और न ही कोई मारपीट की।

हरियाणा की सरकार का रवैया भी काफी विवेकपूर्ण रहा। असलियत तो यह है कि यदि आप सुलझे हुए आदमी हैं और यदि आप सच्चे आस्तिक हैं तो आपको भगवान का नाम किसी भी भाषा में लेने में कोई आपत्ति क्यों करनी चाहिए? जो भगवान किसी हिंदू का पिता है, वही जिहोवा ईसाई और यहूदी के लिए है, वही अल्लाह शिया और सुन्नी मुसलमानों के लिए भी है।

हम यह न भूलें कि 1588 में अमृतसर के स्वर्ण मंदिर गुरुद्वारे की नींव सूफी संत हजरत मियां मीर ने रखी थी। मुझे याद है कि 1983 में जब मैं पेशावर में अफगान नेता (और बाद में जो राष्ट्रपति बने) बुरहानुद्दीन रब्बानी से मिला तो उन्होंने कहा कि ये वक्त हमारी नवाज़े-तरावी का है। वह करके मैं लौटता हूं। फिर आप मेरे साथ शाकाहारी खाना खाकर जाइएगा। मैंने कहा कि मैं भी आपके साथ चलता हूं। आप कुरान की आयतें पढ़ना और मैं वेद-पाठ करुंगा। दोनों में ही ईश्वर की स्तुति के अलावा क्या किया जाता है?

बिल्कुल ऐसा ही वाक्या 52 साल पहले लंदन में हुआ। दिल्ली के महापौर हंसराजी गुप्ता और अटलजी से भी वरिष्ठ नेता जगन्नाथरावजी जोशी मुझे अचानक लंदन के हाइड पार्क में मिल गए। उन्होंने कहा कि एक चर्च में आज शाम को आपका भाषण करवाते हैं। वहां राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की शाखा लगती है। मैं चकरा गया। चर्च में संघ की शाखा? और फिर वहां मेरा भाषण?

पिछले दिनों मैंने एक खबर यह भी पढ़ी थी कि मथुरा या वृंदावन के किसी मंदिर के प्रांगण में किसी मुसलमान युवक ने नमाज पढ़ी तो मंदिर के पुरोहित ने तो स्वीकृति दे दी लेकिन कुछ हिंदू उत्साहियों ने उस युवक के खिलाफ पुलिस में रपट लिखवा दी। कुछ साल पहले लंदन के मेरे एक यहूदी मित्र राबर्ट ब्लम अपने साइनेगॉग (पूजागृह) में मुझे ले गए। उन्होंने वहां ओल्ड टेस्टामेंट का पाठ किया और मैंने वेद-मंत्रों का! वहां बड़े-बड़े यहूदीजन उपस्थित थे लेकिन किसी ने भी मेरा विरोध नहीं किया।

यदि आप सचमुच ईश्वर भक्त हैं तो आपको किसी भी मजहब की ईश्वर-भक्ति, चाहे वह किसी भी भाषा में होती हो, उसका विरोध क्यों करना चाहिए? जो ईश्वर में विश्वास नहीं करते, जैसे जैन और बौद्ध लोग, उनकी प्रार्थना में भी सभी मानवों और जीव-मात्र के कल्याण की प्रार्थना की जाती है।

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