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स्मृति शेष / ‘हिंदी-हटाओ’ आंदोलन से की राजनीतिक करियर की शुरुआत, कलम को मानते थे हथियार

तमिलनाडु के पूर्व मुख्यमंत्री और डीएमके के अध्यक्ष मुत्तुवेल करुणानिधि का मंगलवार शाम चेन्नई के एक निजी अस्पताल में निधन हो गया। वो 94 साल के थे। उन्होंने शाम 6.10 बजे ली। 28 जुलाई की रात तबीयत बिगड़ने के बाद उन्हें द कावेरी हॉस्पिटल में भर्ती किया गया था। अस्पताल में भर्ती किए जाने से पहले वह बुखार और इंफेक्शन से जूझ रहे थे।

साल 1969 में डीएमके के संस्थापक सीएन अन्नादुरै के निधन के बाद करुणानिधि पहली बार तमिलनाडु के मुख्यमंत्री बने थे। उन्होंने लगभग 50 तमिल फिल्मों में पटकथा और संवाद लेखक के तौर पर काम किया था। करुणानिधि ने 27 जुलाई 1969 को डीएमके अध्यक्ष की जिम्मेदारी संभाली थी। बीते शुक्रवार को उन्होंने इस पद पर 49 साल पूरे किए और बतौर अध्यक्ष 50वें साल के कार्यकाल की शुरुआत की।

परिवार में अब कौन हैं वारिस

करुणानिधि जन्म 1924 में ब्रिटिश भारत के मद्रास प्रैज़िडेन्सी में स्थित थिरुक्कुवालाई गांव में हुआ था। अब उस घर को, जहां करुणानिधि पैदा हुए थे, म्यूजियम में बदल दिया गया है। उन्होंने तीन शादियां कीं। उनकी पहली पत्नी पद्मावती का कम उम्र में निधन हो गया। इस शादी से उनके एक बेटे एमके मुथु हैं। इसके बाद करुणानिधि ने दयालु अम्माल और रजति अम्माल से शादी की। दयालु और करुणानिधि के बच्चे एमके अलागिरि, एमके स्टालिन, एमके तमिलारासू और बेटी सेल्वी हैं। इसके बाद उन्होंने तीसरी शादी से उनकी इकलौती बेटी कनिमोझी हैं जो वर्तमान में राज्यसभा सांसद भी हैं।

वह नास्तिक थे लेकिन लोग उन्हें मानते थे भगवान

भगवान के अस्तित्व से इनकार करने वाले नेता, जिसे खुद उसके अनुयायियों ने ‘भगवान’ बनाकर पूजना शुरू कर दिया था। करुणानिधि ने 14 साल की उम्र में ही राजनीति की दुनिया में प्रवेश किया और इसकी शुरुआत हुई ‘हिंदी-हटाओ’ आंदोलन के जरिए की, जब 1937 में हिन्दी भाषा को स्कूलों में अनिवार्य भाषा की तरह लाई गई थी, पेरियार (इरोड वेंकट नायकर रामासामी जिन्हें पेरियार नाम से भी जाना जाता था, बीसवीं सदी के तमिलनाडु के एक प्रमुख राजनेता थे। इन्होंने जस्टिस पार्टी का गठन किया जिसका सिद्धांत रुढ़िवादी हिन्दुत्व का विरोध था।) की विचारधारा से प्रभावित तरुण युवा विरोध में सड़कों पर उतर आए। करुणानिधि ने कलम को अपना हथियार बनाया। लिखना शुरू कर दिया था और नाटक, पर्चे, अखबार, भाषण उनके हथियार बन गए।

वह करते थे चेपौक निर्वाचन क्षेत्र का प्रतिनिधित्व

करूणानिधि को तिरुचिरापल्ली जिले के कुलिथालाई विधानसभा से 1957 में तमिलनाडु विधानसभा के लिए पहली बार चुना गया। वे 1961 में डीएमके कोषाध्यक्ष बने और 1962 में राज्य विधानसभा में विपक्ष के उपनेता बने और 1967 में जब डीएमके सत्ता में आई तब वे सार्वजनिक कार्य मंत्री बने। जब 1969 में अन्नादुरई की मौत हो गई तब करूणानिधि को तमिलनाडु का मुख्यमंत्री बना दिया गया। तमिलनाडु राजनीतिक क्षेत्र में अपने लंबे करियर के दौरान वे पार्टी और सरकार में विभिन्न पदों पर रह चुके हैं।

मई 2006 के चुनाव में अपने गठबंधन द्वारा अपने प्रमुख प्रतिद्वंद्वी जे. जयललिता के हारने के बाद उन्होंने 13 मई 2006 को तमिलनाडु के मुख्यमंत्री का पदभार संभाला। तमिलनाडु राज्य की विधानसभा के सेन्ट्रल चेन्नई के चेपौक निर्वाचन क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते हैं। तमिलनाडु विधानसभा में उन्हें 11 बार और अब समाप्त हो चुके तमिलानडु विधान परिषद में एक बार निर्वाचित किया गया है।

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