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जल संकट / जहां थे वही हैं हम, 2050 आने में ज्यादा वक्त नहीं ?

प्रतीकात्मक चित्र।

भारत में जल संकट जिस तरह से विकराल रूप ले रहा है, उसका अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है हमारे पास साल 2021 में पीने का स्वच्छ पानी नहीं है। जो पानी हम पी रहे हैं उसकी गुणवत्ता किसी ना किसी वजह से खराब है। भारत में सबसे ज्यादा प्रदूषित शहरों में यह स्थिति और भी ज्यादा खतरनाक है।

भारत में जल का संकट एक बड़ी समस्या बनकर उबर रही है। साल 2018 में नीति आयोग द्वारा किये गए एक अध्ययन में 122 देशों के जल संकट की सूची में भारत 120वें स्थान पर खड़ा था। जल संकट से जूझ रहे दुनिया के 400 शहरों में से शीर्ष 20 में 4 शहर (चेन्नई पहले, कोलकाता दूसरे, मुंबई 11वां तथा दिल्ली 15 नंबर पर है) भारत में है। तीन साल बाद यानी 2021 में भी यही स्थित है। इसमें कोई भी ज्यादा सुधार नहीं हुआ है। कई रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि साल 2050 में पीने के स्वच्छ पानी की समस्या अपने शीर्ष पर होगी।

जल संकट के मामले में चेन्नई और दिल्ली जल्द ही दक्षिण अफ्रीका का केप टाउन शहर बनने की राह पर है। संक्युत जल प्रबंधन सूचकांक के अनुसार देश के 21 शहर जीरो ग्राउंड वाटर लेवल पर पंहुच जाएंगे, यानी इन शहरों के पास पीने का ख़ुद का पानी भी नहीं होगा। जिसमें बंगलुरु, चेन्नई, दिल्ली और हैदराबाद जैसे शहर शामिल हैं जिसके चलते 10 करोड़ लोगों की जिंदगी प्रभावित होगी।

देश के ग्रामीण इलाकों में जल अभाव शहरों की तरफ पलायन की एक बड़ी वजह है। भारत में जल प्रणाली व्यवस्थित न होने की वजह से वितरण में असमानता है। विश्व स्वाथ्य संगठन (WHO) के मुताबिक़ एक व्यक्ति को अपने ज़रूरतों को पूरा करने के लिए हर दिन करीब 25 लीटर पानी की आवश्यकता होती है।

भारत के बड़े शहरों जैसे दिल्ली, मुंबई में नगर निगम द्वारा निर्धारण 150 लीटर प्रति व्यक्ति प्रतिदिन से भी ज्यादा पानी दिया जाता है. दिल्ली प्रति व्यक्ति पानी के खपत के लिहाज से दुनिया में पहले स्थान पर है। यहां पानी की प्रति व्यक्ति प्रतिदिन खपत 272 लीटर है, जिसकी बड़ी वजह पानी की बर्बादी और औद्योगिक खपत है तथा घरों में पानी के उपयोग की कोई मानक सीमा का न होना भी है।

एराइज एंड अवेक एनजीओ के निदेशक हैं डॉ संजय सिंह बताते हैं कि, ‘मौजूदा दौर में भारत में जहां शहरों में गरीब इलाकों में रहने वाले 9.70 करोड़ लोगों को पीने का साफ पानी नहीं मिल पाता है. वही ग्रामीण इलाकों में 70 फीसदी लोग प्रदूषित पानी पीने को मजबूर है। लगभग 33 करोड़ लोग अत्यंत सूखे ग्रसित जगहों पर रहने को मजबूर है। जल संकट की इस स्थिति से देश की जीडीपी में अनुमानतः 6% का नुकसान होने की आशंका है।’

कैसे हो सकता है समाधान

इंटर गवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज के आंकलन के अनुसार साल 2050 तक वैश्विक आबादी 1,000 करोड़ के पार चली जाएगी। साथ ही उसमें बताया गया था कि किस तरह कृषि क्षेत्र में उचित जल प्रबंधन के जरिये, ग्लोबल वार्मिंग के खतरे से निपटा जा सकता है। दुनिया में अनेकों जगह कृषि तकनीकों के जरिये भूजल उपयोग को सीमित करने में सफलता हासिल की है, जैसे कि दक्षिण-पूर्व एशिया में मेकांग डेल्टा के कुछ हिस्सों में जहां पायलट प्रोजेक्ट के रूप में पानी की अधिक खपत करने वाली धान की फसलों की जगह नारियल की खेती की जा रही है।

यदि हम आज नहीं जागे तो हमारी आने वाली नस्लों को ऐसे भू-जल संकट का सामना करना पड़ेगा, जिसके प्रभाव किसी टाइम बम से कम नहीं होंगे। क्योंकि जिस अनियंत्रित तरीके से हम इस संसाधन का दोहन कर रहे हैं, और उसके चलते भूजल स्रोतों पर जो दबाव बढ़ता जा रहा है। इसके परिणाम अति गंभीर होंगे क्योंकि इन भूमिगत जल प्रणालियों को फिर से भरने में दशकों का समय लगेगा।

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