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#TGIP / जब नेता ईमानदार और योग्य नहीं, तो फिर ‘नोटा’ क्यों नहीं?

Picture Courtesy: Swathi Vijay/Facebook

लोकसभा चुनाव में हर बार की तरह इस बार भी राजनीतिक दल अपनी पार्टी के घोषणा पत्र लेकर जनता के सामने मौजूद हैं। घोषणा पत्र की कितनी बातों को 5 साल में पूरा किया जाता है ये पब्लिक है सब जानती है, लेकिन जो नहीं जानते उनके लिए यह जान लेना जरूरी है, यदि आप किसी भी राजनीतिक पार्टी को अपने मानकों पर खरा नहीं पाते तो मतदान करते समय NOTA ‘नोटा’ का बटन दबा सकते हैं।

भारत के हर मतदाता को अपना नेता चुनने के पूरी आजादी है, लेकिन वह किसी कारण से अपना सांसद चुनने में निर्णय नहीं ले पा रहा है तो नोटा क्यों नहीं? यही बात को बयां करते हुए दक्षिण भारत का एक कलाकार दंपति अपने अभियान के तहत लोगों को बता रहा है।

वो मतदाताओं से इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) में NOTA (उपरोक्त में से कोई नहीं) विकल्प चुनने का आग्रह कर रहे हैं। हैदराबाद के रहने वाले कलाकार स्वाति और विजय द्वारा यह अभियान भारत के वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में ईमानदार नेताओं की अनुपस्थिति को उजागर करता है। उन्होंने हैदराबाद और उसके आसपास कुछ सप्ताह पहले यह अभियान शुरू किया, और बाद में तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और महाराष्ट्र के कुछ हिस्सों में पहुंच गए।

राजनीति में ईमानादर नेता क्यों नहीं?

तेलंगाना में जहां 11 अप्रैल से मतदान शुरू होगा, स्वाति और विजय का संदेश लोगों को अपने तरीके से पढ़ाते हैं। वह लोगों को भी अपने अभियान में जोड़ते हैं जो एक साइन बोर्ड पर गहरे काले बोल्ड अक्षरों में लिख कर किसी चौराहे पर खड़े हो जाते हैं, जिस बोर्ड पर लिखा होता है…

यह संदेश बोल्ड कैपिटल अक्षरों में शीर्षक ‘मिसिंग ईमानदार राजनेता’ के साथ है, और इसमें हैशटैग #FindHonestPoliticians दिया गया है। संदेश विभिन्न निर्वाचन क्षेत्रों के लिए मतदान की तारीखों के अनुसार बदल जाता है, लेकिन मूल स्क्रिप्ट वही रहती है।

NOTA कब हो जाता है जरूरी

एक बेहतर प्रयास के लिए आगे आने वाले विजय द फीचर टाइम्स को बताते हैं, ‘आज ईमानदार नेता नहीं है या जो हैं वो बहुत कम हैं, नेता चाहे किसी भी राज्य का हो। हम लोगों से पूछना चाहते हैं कि वे अपना वोट बर्बाद न करें। हम स्पष्ट रूप से NOTA का बटन दबाने का नहीं कह रहे हैं, लेकिन उस विकल्प का लाभ मतदाता तब उठाए जब किसी भी उम्मीदवार वह अपनी नजर में ईमानदार और वफादार नहीं मानता।’

विजय आगे कहते हैं लोग अमूमन चुनावी उम्मीदवारों में से किसी को भी योग्य नहीं पाते हैं, फिर भी वे या तो उनमें से किसी एक के लिए वोट देते हैं। हम यह विचार रखने की कोशिश कर रहे हैं कि उनका वोट डालना वास्तव में हर नागरिक के लिए ज्यादा जरूरी है। उस संदर्भ में तो बेहद जरूर जब लोकतंत्र में आप उम्मीदवारों को अस्वीकार करने का विकल्प मौजूद है, यदि आप अपने सभी स्थानीय नेताओं के काम से नाराज हैं तो निश्चित रूप से आपको NOTA के जरिए एक ‘ईमानदार वोट’ देना चाहिए।

तो फिर NOTA क्यों नहीं?

NOTA के बारे में अमूमन गलत धारणा है कि NOTA मतदान में एक वोट बर्बाद कर रहा है, लेकिन स्वाति और विजय को लगता है कि लोकतंत्र में अपना नेता चुनने या असहमति प्रकट करने का एक एक बेहतर उपाय है।

विजय बताते हैं, ‘हमें 200 साल के संघर्ष के बाद आजादी मिली। इसलिए, यह स्पष्ट है कि NOTA के लिए मतदान के परिणाम तुरंत प्रमुखता में नहीं उभरेंगे, लेकिन, यह अधिकारियों को एक संदेश भेजता है कि लोग वर्तमान संभावित सांसदों को खारिज कर रहे हैं। भविष्य में, यह एक ऐसे कानून का मार्ग बना सकता है जो बेईमान उम्मीदवारों को चुनाव लड़ने से रोकेगा।’

नेता चुप हैं और जागरूक है जनता

उन्हें अब तक अपनी रचनात्मक स्वतंत्रता पर अंकुश लगाने के लिए किसी बड़ी राजनीतिक या प्रशासनिक आपत्ति का सामना नहीं करना पड़ा है। यह एक अच्छा नजरिया है। वे जनता से मिल रहे हैं और जनता के सकारात्मक और जिज्ञासु प्रतिक्रिया से खुश हैं, यही वजह है कि उन्होंने अब अपने अभियान को आकर्षक व्याख्यान और बड़े पैमाने पर जागरूकता बढ़ाने के अन्य तरीकों के साथ बढ़ाया है। विजय बताते है, ‘एक बात सुनिश्चित है, हम जनता के बीच स्पष्ट राजनीतिक बातचीत शुरू करने में कामयाब रहे हैं।’

यदि गौर से देखें तो स्वाति और विजय की अपील में एक समान तर्क है कि 2014 के लोकसभा चुनावों में देशभर में 60 लाख से अधिक मतदाताओं ने NOTA बटन का उपयोग किया, स्पष्ट रूप से वो अपने संबंधित क्षेत्रों में राजनीतिक परिदृश्य और उम्मीदवार नेताओं के प्रति अस्वीकृति पेश की थी।

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NOTA भले ही मतदान में भारतीय राजनीति को भ्रष्टाचार से मुक्त कर पाए, लेकिन यह वास्तव में राजनीतिक दलों को अपने उम्मीदवारों पर पुनर्विचार करने और लोगों को उनके नेताओं में ईमानदारी से सोचने के लिए प्रेरित कर रही है।

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