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दूरदर्शन / सूरत और सीरत में बदलाव, नहीं बदली ‘कार्यशैली’

अस्सी और नब्बे का दशक दूरदर्शन के स्वर्णिम इतिहास का गवाह रहा है। 15 सितंबर, 1959 से शुरू हुआ, ‘दूरदर्शन’ सन् 2021 में 62 साल पूरे कर रहा है। इन 62 साल में दूरदर्शन की सूरत और सीरत दोनों ही बदली है, नहीं बदली है तो दूरदर्शन की कार्यशैली, जिसकी वजह से वह आंतरिक और संचार की दुनिया में उतना प्रभावशाली नहीं है, जितना वो हो सकता था।

दूरदर्शन सरकारी व्यवस्था का एक पुर्जा है इसमें कोई दोराय नहीं, क्योंकि इस सशक्त माध्यम को सरकार अपने मनमाने तरह से चलाती हैं, यूं कहें तो दूरदर्शन सरकार के हाथों की कठपुतली है। बहरहाल दूरदर्शन का शुरूआत का श्रेय उन लोगों को जाता है, जिन्होंने उस दौर में नए दौर का सपना देखा और उसे साकार करने के लिए दूरदर्शन जैसी मजबूत संस्था को मूर्त रूप दिया।

जब दूरदर्शन शुरू हुआ तो यह एक प्रयोग था, उस दौरान शिक्षा और विकास कार्यक्रमों को बोल-बाला हुआ करता था, तब इसे टेलीविजन इंडिया के नाम से भी संबोधित किया जाता था और इसका संचालन ऑल इंडिया रेडिया करता था।

दूरदर्शन पर सन् 1965 से लगातार कार्यक्रम प्रसारित किए जाने लगे। सन् 1966 में शुरू हुए कृषि दर्शन का योगदान देश में हरित क्रांति लाने में भी रहा है। सन् 1975 में देश के 6 राज्यों में सैटेलाइट इन्स्ट्रक्शनल टेलीविजन एक्सपेरिमेंट (SITE) शुरू किया गया। इन राज्यों में सामुदायिक टेलीविजन सेट लगाए गए और इस तरह सन् 1976 में दूरदर्शन ऑल इंडिया रेडियो से अलग हो गया।

    सन् 1982 का साल दूरदर्शन और भारत में टीवी के लिए महत्वपूर्ण था। इसी साल दूरदर्शन ने इनसैट-1 के जरिए पहली बार राष्ट्रीय प्रसारण किया। एशियाई खेलों के प्रसारण ने तो दूरदर्शन की लोकप्रियता को कई गुना बढ़ा दिया था। टेलीविजन अब एक नए दौर में पहुंचा, जहां नए चेहरे, नए कार्यक्रम प्रसारित किए गए।

    आज दूरदर्शन के 34 सैटेलाइट चैनल हैं। देश में 66 स्टूडियो हैं, जिनमें से 17 राज्यों की राजधानियों में हैं और बाकी 49 अलग-अलग शहरों में हैं। दूरदर्शन देश का सबसे बड़ा ब्रॉडकास्टर है, जिसकी पहुंच, कश्मीर से कन्याकुमारी और लद्दाख जैसे केंद्र शासित प्रदेशों में है।

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