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किसान उवाच / तो क्या सिर्फ सुपर मार्केट का दौर, जहां महंगाई बनेगी सिरमौर

  • शिवम बघेल। लेखक किसान हैं और वो सिवनी (मध्यप्रदेश) में रहते हैं।

पहले कानून यानी फार्मर्स प्रोड्यूस ट्रेड एन्ड कॉमर्स ऑर्डिनेन्स 2020 से आपने जाना कि, किस तरह सरकार किसानों के साथ कथनी-करनी में फर्क कर रही है। इसमें एक महत्वपूर्ण बात यह भी है कि किसान और कम्पनी के बीच विवाद होने की स्थिति में इस अध्यादेश के तहत न्यायालय (कोर्ट) का दरवाजा नहीं खटखटाया जा सकता है। दूसरा कानून क्या कहता है इसे विस्तार से यहां जानें…

दूसरा कानून : एसेंशियल कमोडिटी एक्ट 1955 में संसोधन

किसानों को यह समझना होगा कि पहले व्यापारी फसलों को किसानों के औने-पौने दामों में खरीदकर उसका भंडारण कर लेते थे और कालाबाज़ारी करते थे, उसको रोकने के लिए Essential Commodity Act 1955 बनाया गया था। जिसके जरिए व्यापारियों द्वारा कृषि उत्पादों के एक लिमिट से अधिक भंडारण पर रोक लगा दी गई थी।

अब नए कानून के तहत आलू, प्याज़, दलहन, तिलहन व तेल के भंडारण पर लगी रोक को हटा ली गई है। समझने की बात यह है कि हमारे देश में 85% लघु किसान हैं, किसानों के पास लंबे समय तक भंडारण की व्यवस्था नहीं होती है। वैसे भी किसान के पास वर्तमान में आय बहुत कम है छोटा किसान हो या बड़ा किसान हो वह अपनी उपज को ज्यादा दिन तक रोकने में सक्षम नहीं है क्योंकि किसान को फसल कटाई के बाद जल्द पैसों की आवश्यकता होती है।

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यहां ग़ौर करने वाली सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है की किसान अपनी उपज को कितने भी दिन तक भंडारण करके इसके पहले भी रख सकता था। जो कानूनी रोक थी वो सिर्फ बड़ी कंपनियों और व्यापारियों के भंडारण करने पर थी सिर्फ उसे हटाया गया है। यानी व्यापारी और बड़ी कंपनियां अब स्टोर कर सकेंगे। यह कैसा किसान हितैषी फैसला हुआ? इससे तो सिर्फ रईस व्यापारियों को कालाबाजारी करने का पूरा मौका मिला है।

यह कानून बड़ी कम्पनियों द्वारा कृषि उत्पादों की कालाबाज़ारी के लिए लाया गया है, ये कम्पनियां और सुपर मार्केट अपने बड़े-बड़े गोदामों में कृषि उत्पादों का भंडारण करेंगे और बाद में ऊंचे दामों पर ग्राहकों को बेचेंगे। इससे किसान तो बुरी तरह प्रभावित होगा ही पर देश का आम उपभोक्ता भी बार-बार मंहगाई का शिकार होगा।

किसान फसल बोनी से एक महीना पहले से असमंजस में रहता है कि कौन-सी फसल की बोनी करे तो वह अमूमन जिस फसल के दाम अधिक होते हैं उसे चुन लेता है। इस बात को गंभीरता से सोचिए कि बड़े उद्दोगपतियों द्वारा अतिरिक्त भंडारण की गई फसल के बोनी के समय रेट ज्यादा रहेंगे तो किसान महंगी फसल को बोएगा।

लेकिन किसान की फसल बोने के 4 से 5 महीना बाद मार्केट में आएगी तब तक बड़े प्लयेर अपनी स्टॉक की हुई फसल को फिर से मार्केट में निकालेंगे। इससे किसान की फसल आते तक फिर दाम बहुत ज्यादा गिर जाएंगे। ऐसे में किसान का फिर से शोषण होगा। फिर किसान की सस्ती फसल को बड़े प्लेयर खरीद कर स्टॉक कर लेंगे और उसका दाम बढ़ा देंगे यही क्रम चलता रहेगा।

अमेरिका में 1970 से ओपन मार्केट कमोडिटी एक्ट है मतलब आज जो हिंदुस्तान में सरकार बदल रही है वह व्यवस्था अमेरिका में 50 साल पहले से है। वहां वॉलमार्ट, नेक्सेस जैसी बड़ी कंपनियां किसान की फसल को खरीद कर ऐसे ही भण्डारण कर लेती हैं।

जिसका परिणाम आज यह है कि अमेरिका में 2018 के एक अध्ययन में 91% किसान कर्जदार थे। जिन पर 425 बिलियन डॉलर का कर्ज है और 87% अमेरिकी किसान आज खेती छोड़ना चाहते हैं। लेकिन वहां के किसान आज सिर्फ सरकारी मदद से टिके हुए हैं। आज अमेरिका में किसान को 242 बिलियन डॉलर यानी लगभग 7 लाख करोड़ रुपया की सरकारी सब्सिडी मिलती है। तो इससे यह साफ होता है कि जो मॉडल अमेरिका में फैल हो चुका है उसे वर्तमान सरकार यहां लागू करना चाहती है।

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एक उदाहरण से हमें और समझना चाहिए कि यह कानून किसान को कैसे खत्म करेगा। पिछले कुछ दिन पहले सिवनी जिला मध्यप्रदेश के किसानों ने मक्का समर्थन मूल्य 1850 रुपए क्विंटल से काफी कम दाम लगभग 900 से 1000 रुपए में बिक रहा था। उसके लिए ‘ऑनलाइन किसान सत्याग्रह’ किए थे इसके बावजूद भी केंद्र सरकार ने किसानों को राहत न देते हुए मक्का से संबंधित बड़ी कंपनियों को विदेश से 5 लाख मीट्रिक टन मक्का आयात करने की छूट दे दी।

अमेरिका में वर्तमान में मक्का का दाम 145 डॉलर प्रति टन मतलब 1060 रुपए प्रति क्विंटल है। हमारे देश की कंपनियां 1000 से 1100 रुपया क्विंटल भाव का मक्का आयात करके गोदामों में भंडारण कर लेंगी और किसान की भी फसल आज से 2 महीना बाद मार्केट में आने लगेगी तो किसान को फिर 800 से900 रुपया का दाम मिलेगा। इससे किसान की लागत जो एक क्विंटल मक्का उगाने में 1213 रुपए सरकार खुद मानती है वह भी नहीं मिलेगा।

क्रमश:

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