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वेटिकन सिटी / पोप से मोदी की मुलाकात पर हंगामा क्यों?

ईसाई धर्मगुरु संत पोप फ्रांसिस से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आत्मीय भेंट करते हुए। चित्र सौजन्य : नरेंद्र मोदी/ट्विटर

  • डॉ. वेदप्रताप वैदिक।

भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जिस भाव भीने ढंग से वेटिकन में पोप फ्रांसिस से मिले, उसके फोटो अखबारों और टीवी पर देखकर कोई भी चकित हो सकता है। वैसे मोदी सभी विदेशी महाप्रभुओं से इसी गर्मजोशी के साथ मिलते हैं, चाहे वह डोनाल्ड ट्रंप हो या जो बाइडन हो। लेकिन यह एकतरफा अति उत्साह नहीं है। सामने वाले की गर्मजोशी भी उतनी ही दर्शनीय हो जाती है।

लेकिन मोदी की पोप से हुई भेंट को न तो केरल के कुछ ईसाई और न ही कुछ कम्युनिस्ट नेता आसानी से पचा सकते हैं लेकिन वे यह न भूलें कि पोप से मिलने वाले ये पहले भारतीय प्रधानमंत्री नहीं है। इनके पहले चार अन्य भारतीय प्रधानमंत्री पोप से वेटिकन में मिल चुके हैं। वे हैं जवाहरलाल नेहरु, इंदिरा गांधी, इंदर गुजराल और अटलबिहारी वाजपेयी।

अप्रैल 2005 में जब पिछले पोप का निधन हुआ तो भारत के उप-राष्ट्रपति भैरोसिंह शेखावत स्वयं वेटिकन गए थे। उस समय यह प्रश्न भारत और फ्रांस दोनों जगह उठा था कि यदि आपका राष्ट्र धर्म-निरपेक्ष है तो केथोलिक धर्म गुरु की अंत्येष्टि में आपका प्रतिनिधि शामिल क्यों हो? इसका जवाब यह है कि पोप की धार्मिक हैसियत तो है ही लेकिन वेटिकन एक राज्य भी है और पोप उसके सर्वोच्च शासक हैं।

वैसे, किसी भी देश के राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री रोम जाते हैं तो वे पोप से प्रायः मिलते हैं लेकिन मोदी और पोप की इस भेंट से जो लोग नाराज हुए हैं, उनकी शिकायत है कि मोदी-राज में ईसाइयों और मुसलमानों पर काफी जुल्म हो रहे हैं लेकिन भाजपा इस भेंट का इस्तेमाल उन जुल्मों पर पर्दा डालने के लिए करेगी।

इतना ही नहीं, गोवा और मणिपुर के आसन्न चुनावों में ईसाई वोटों को भी इस भेंट के बहाने पटाने की कोशिश करेगी। इस भेंट का इस्तेमाल नागालैंड, मिजोरम तथा देश के अन्य हिस्सों में रहने वाले ईसाइयों को लुभाने के लिए भी किया जाएगा। यह संदेह निराधार नहीं है लेकिन सरकार के प्रवक्ता ने दो-टूक शब्दों में कहा है कि इस भेंट के दौरान धर्मांतरण का सवाल उठा ही नहीं।

धर्मांतरण के सवाल पर भाजपा-शासित राज्य कड़े कानून बना रहे हैं और संघ के महासचिव दत्तात्रय होसबोले ने भय और लालच दिखाकर किए जा रहे धर्मांतरण को अनैतिक और अवैधानिक बताया है। सिर्फ संख्या बढ़ाने के लिए धर्म-परिवर्तन कराने के गलत तरीकों पर पोप भी कोई रोक नहीं लगाते।

अब तो पोपों की व्यक्तिगत पवित्रता पर कभी सवाल नहीं उठता लेकिन यूरोप में उसके पोप-शासित हजार साल के समय को अंधकार-युग माना जाता है। इस काल में पोपों को अनेक कुत्सित कुकर्म करते हुए और लोगों को ठगते हुए पाया गया है। इसीलिए ईसाई परिवारों में पैदा हुए वाल्तेयर, विक्टर ह्यूगो, कर्नल इंगरसोल और बुकनर जैसे विख्यात बुद्धिजीवियों ने पोप-लीला के परखचे उड़ा दिए थे।

केथोलिक चर्च के इसी पाखंड पर प्रहार करने के लिए कार्ल मार्क्स ने धर्म को अफीम की संज्ञा दी थी। आशा है, पोप फ्रांसिस जब भारत आएंगे तो वे अपने पादरियों से कहेंगे कि ईसा के उत्तम सिद्धांतों का प्रचार वे जरुर करें लेकिन सेवा के बदले भारतीयों का धर्म नहीं छीनें।

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