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कॉप – 26 / क्या भारत 2070 तक ‘नेट जीरो’ का लक्ष्य हासिल करेगा?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, कॉप -26 जलवायु परिवर्तन सम्मेलन में मंच के नजदीक से जाते हुए। चित्र सौजन्य : नरेंद्र मोदी/फेसबुक।

  • सौम्य सरकार। ग्लासगो, स्काटलैंड ‘जलवायु परिवर्तन सम्मेलन कॉप- 26 से’ विशेष रिपोर्ट।

भारत ने ग्लासगो अंतरराष्ट्रीय जलवायु परिवर्तन सम्मेलन यानी कॉप – 26 में, साल 2070 तक नेट जीरो का लक्ष्य हासिल करने की घोषणा कर दुनिया को चौका दिया है। सनद रहे कि भारत न केवल दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जक है बल्कि जलवायु परिवर्तन से सबसे अधिक प्रभावित होने वाले देशों में भी शुमार है। ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि क्या भारत 2070 तक अपने लक्ष्य को हासिल कर पाएगा?

भारत के नेट-जीरो हासिल करने की इस घोषणा से अब सारा ध्यान अमीर देशों द्वारा उपलब्ध कराए जाने वाले वित्तीय सहयोग पर टिक गया है। अपने सम्बोधन में भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गरीब देशों को जलवायु परिवर्तन को कम करने में मदद के तौर पर अमीर देशों से एक लाख करोड़ डॉलर की मांग की। प्रारंभिक उत्साह के बाद, वैश्विक स्तर पर किए गए इन प्रतिबद्धताओं को हासिल करना भारत के लिए कठिन होने वाला है। विकासशील अर्थव्यवस्था, बढ़ती ऊर्जा जरूरतें और तेजी से होता औद्योगिकीकरण के मद्देनजर मौजूदा संसाधनों के बेहतर उपयोग पर जोर देने की जरूरत है।

ग्लासगो में संयुक्त राष्ट्र का जलवायु सम्मेलन की शुरुआत में ही एक बड़ा मोड़ आया जब भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कई बड़ी घोषणाएं की और दुनिया को चौंका दिया। मोदी ने घोषणा की कि भारत 2070 तक वातावरण में ग्रीनहाउस गैसों में अपना योगदान शून्य कर लेगा। मालूम रहे कि ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन से ग्लोबल वार्मिंग हो रही है और पृथ्वी के अस्तित्व पर संकट मंडरा रहा है।  

ग्लासगो शिखर सम्मेलन की तैयारियों के समय भारत पर अपनी स्वैच्छिक राष्ट्रीय लक्ष्य को और विस्तार देने का दबाव था। पर मोदी ने एक कदम आगे जाते हुए नेट-जीरो हासिल करने की घोषणा कर दी। इस तरह मोदी ने भारत को उन देशों की कतार में खड़ा कर दिया जिन्होंने पहले से ऐसी घोषणा कर रखी है। इसमें संयुक्त राष्ट्र अमेरिका, युरोपियन यूनियन और चीन शामिल हैं। ये देश कार्बन उत्सर्जन में भी सबसे आगे हैं। नेट-जीरो से तात्पर्य ग्रीनहाउस गैस के उत्सर्जन को शून्य करना है। 

स्कॉटलैंड के शहर ग्लासगो में, जलवायु सम्मेलन बड़ी उम्मीदों के साथ शुरू हुआ।  इस सम्मेलन में कम से कम 120 देशों के शीर्ष नेता शामिल हो रहे हैं। पूरी दुनिया के लोग इन नेताओं से उम्मीद की नजर से देख रहे हैं कि ये जलवायु परिवर्तन की तबाही को नियंत्रित कर मानवता को बचाएंगे। इस सम्मेलन को एक ‘आखिरी उम्मीद या मौका’ के तौर पर देखा जा रहा है जहां देश के शीर्ष नेता बड़े कदम उठाकर पृथ्वी के तापमान में हो रही वृद्धि को नियंत्रित कर सकते हैं। इस लक्ष्य के अनुसार पृथ्वी के बढ़ते तापमान को औद्योगिक युग की शुरुआत की तुलना में 1.5 डिग्री सेल्सियस के भीतर ही रोकना है। 

संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम ने शिखर सम्मेलन से कुछ दिन पहले एक रिपोर्ट जारी कर कठिन भविष्य की चेतावनी दी थी। इसके अनुसार ऐतिहासिक 2015 पेरिस समझौते के तहत जितने भी राष्ट्रीय योजना तैयार हुए हैं, उन सबको अगर सही से लागू कर भी दिया जाए तो भी पृथ्वी का तापमान 2100 तक 2.7 डिग्री बढ़ जाएगा। इस ग्लोबल वार्मिंग से सबसे अधिक पिछड़े और विकासशील देशों में रहने वाले अरबों लोग बहुत प्रभावित होंगे। 

मोदी ने अपने संबोधन में कहा, ‘कई विकासशील देशों के लिए, जलवायु परिवर्तन उनके अस्तित्व पर संकट जैसा है। हमें दुनिया को बचाने के लिए आज बड़े कदम उठाने होंगे। यही समय की मांग है।’

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दिया ‘पंचामृत सिद्धांत

जलवायु कार्रवाई के प्रति भारत की प्रतिबद्धता के पांच प्रमुख तत्व होंगे। प्रधानमंत्री मोदी ने इसे पंचामृत का नाम दिया। भारत 2030 तक अपनी गैर-जीवाश्म ऊर्जा क्षमता बढ़ाकर 500 गीगावाट कर लेगा। 2030 आते-आते, देश अक्षय ऊर्जा से अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं का 50 प्रतिशत पूरा करने लगेगा। अभी से 2030 तक कुल अनुमानित कार्बन उत्सर्जन में एक अरब टन की कमी करेगा। यह अपनी अर्थव्यवस्था की कार्बन तीव्रता (कार्बन इन्टेन्सिटी) को 45 प्रतिशत कम करेगा। इन सबके के अतिरिक्त, भारत 2070 तक नेट-जीरो का लक्ष्य भी हासिल करेगा।

भारतीय प्रधानमंत्री ने कहा, ‘इस पंचामृत के जरिए जलवायु कार्रवाई की लड़ाई में भारत अपना अभूतपूर्व योगदान देगा।’ अपनी विशिष्ट शैली में बोलते हुए मोदी ने अपने भाषण में ‘लाइफ’ का नारा दिया। उन्होंने कहा, ‘लाइफस्टाइल फॉर एनवायरनमेंट (लाइफ) को एक अभियान के रूप में आगे ले जाने की जरूरत है। सबको मिलकर इस लक्ष्य के लिए एक मुहिम चलाना होगा।’

भारत द्वारा निर्धारित नए लक्ष्यों का मतलब यह नहीं है कि इस दशक के अंत तक देश का कुल उत्सर्जन कम हो जाएगा।  लेकिन इन लक्ष्यों से ग्लोबल वार्मिंग को लेकर चल रहे मुहिम और सार्थक जरूर होगी। पुराने लक्ष्यों के बनिस्बत। 

इंटरगवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट के वैज्ञानिक अनुमानों के अनुसार, पृथ्वी के तापमान को 1.5 डिग्री से अधिक न बढ़ने देने के लिए, दुनिया को 2050 तक कार्बन उत्सर्जन को शून्य करना होगा। फिर 2070 तक सभी ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को शून्य करना होगा। 

भारत के इस घोषणा का सबने स्वागत किया है। इंटरनेशनल सोलर अलायंस के महानिदेशक अजय माथुर ने कहा, ‘प्रधानमंत्री मोदी ने बयानबाजी से इतर जाते हुए जलवायु परिवर्तन की अपनी लड़ाई में एक बड़ा वादा किया है।’ इंटरनेशनल सोलर अलायंस की, भारत और फ्रांस ने 2015 के पेरिस शिखर सम्मेलन के दौरान, घोषणा की थी। 

हालांकि भारत में दुनिया की 17 प्रतिशत आबादी रहती है पर कुल उत्सर्जन में इस देश का योगदान महज 5 प्रतिशत ही है। मोदी ने कहा, ‘दुनिया की पूरी आबादी से अधिक लोग भारतीय रेलवे में हर साल यात्रा करते हैं। इस विशाल रेलवे के नेटवर्क ने 2030 तक खुद को नेट-जीरो बनाने का लक्ष्य रखा है, सिर्फ रेलवे की इस पहल से उत्सर्जन में हर साल 6 करोड़ टन की कमी आएगी।’

वित्तीय सहयोग पर अब सबका ध्यान 

भारत ने अपनी महत्वाकांक्षी घोषणाओं से पूरी दुनिया को चौंका दिया। इसका जो सबसे बड़ा असर होने वाला है वह यह कि अब इस सम्मेलन का पूरा ध्यान सबसे विवादास्पद मुद्दे पर टिका रहेगा। यह मुद्दा है क्लाइमेट फाइनैन्स या अमीर देशों को कमजोर देशों को जलवायु परिवर्तन की लड़ाई में दिया जाने वाला आर्थिक सहयोग। 

भारत के प्रधानमंत्री ने कहा, ‘अब यह जरूरी हो गया है कि हम जैसे जलवायु शमन (मिटीगेशन) की प्रगति को ट्रैक करते हैं वैसे ही क्लाइमेटट फाइनैन्स को भी ट्रैक करें।’ उन्होंने मांग की कि अमीर देश जल्द से जल्द 1 लाख करोड़ डॉलर का वित्तीय सहयोग प्रदान करें। 

विकसित देश, गरीब देशों को जलवायु परिवर्तन के बुरे प्रभावों को कम करने में मदद करने से आनाकानी करते रहे हैं। खासकर वित्तीय सहयोग के मामले में। 2009 में, अमीर देश इस बात पर सहमत हुए थे कि 2020 से हर साल वे गरीब देशों को 10,000 करोड़ डॉलर प्रदान करेंगे। 2015 में पेरिस समझौते के तहत इस सामूहिक लक्ष्य की फिर से पुष्टि भी हुई। हालांकि, पिछले सप्ताह जारी क्लाइमेट फाइनेंस डिलीवर प्लान में इन देशों ने कहा कि वे 2023  से ही सहयोग कर पाएंगे। 

नई दिल्ली स्थित थिंक टैंक काउंसिल फॉर एनर्जी, एनवायरनमेंट एंड वाटर के मुख्य कार्यकारी अरुणाभ घोष ने कहा, ‘भारत ने गेंद अब विकसित देशों के पाले में डाल दिया है। अब भारत ने यह भी मांग कर दी है कि विकसित देश जल्द से जल्द जलवायु वित्त के तौर पर 1 लाख करोड़ डॉलर की मदद करें। इसके अतिरिक्त यह भी घोषणा कर दी है कि देश न केवल क्लाइमेट एक्शन बल्कि क्लाइमेट फाइनैन्स पर भी नजर बनाये रखेगा।’

ग्लासगो सम्मेलन से ठीक पहले हुए जी-20 राष्ट्रों के हाल ही में हुए रोम शिखर सम्मेलन में निराशा ही हाथ लगी। इस सम्मेलन में शामिल होने वाले देश कुल वैश्विक उत्सर्जन के 80 प्रतिशत के लिए जिम्मेदार हैं। जी20 की इस बैठक में वित्तीय सहयोग का कोई जिक्र नहीं किया गया जबकि इसमें चीन और भारत को छोड़कर सभी विकसित देश भाग ले रहे थे। 

इंस्टीट्यूट फॉर एनर्जी इकोनॉमिक्स एंड फाइनेंशियल एनालिसिस से जुड़े ऊर्जा अर्थशास्त्री विभूति गर्ग कहती हैं, ‘भारत का जलवायु न्याय की मांग करना तर्कसंगत है। इस मांग में विकसित देशों से प्रौद्योगिकी हस्तांतरण के साथ-साथ वित्त सहयोग की मांग भी शामिल हैं।’

विशेषज्ञों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन से जुड़े समझौतों में भाग लेने वाले रणनीतिकार, अमीर देशों से वित्तीय सहयोग लेने में न केवल ग्लासगो बल्कि भविष्य में भी मुश्किल का सामना करेंगे। यह तब है जब वित्तीय सहयोग बराबरी और न्याय के सिद्धांतों पर आधारित है। हालांकि,  अब यह स्पष्ट हो गया है कि किसी भी अंतरराष्ट्रीय स्तर की वार्ता में अमीर देशों से मिलने वाला वित्तीय सहयोग मुख्य मुद्दा रहने वाला है। 

नेट-जीरो हासिल करने में भारत के सामने चुनौती

हालांकि शिखर सम्मेलन के पहले दिन ही भारत की बड़ी घोषणा कर के ग्लासगो में हो रही वार्ता की दिशा तय कर दी पर मोदी के घोषित पांच सिद्धांतों पर करीब से नज़र डालने से पता चलता है कि यह इनको हासिल करना इतना आसान भी नहीं होने वाला है। 

पहली घोषणा में बिजली क्षेत्र में सुधार भी शामिल है जो उत्सर्जन को कम करने के लिए महत्वपूर्ण है। वर्तमान में कोयले का उपयोग लगभग 70 प्रतिशत घरेलू बिजली उत्पादन के लिए किया जाता है। 2014 में जब नरेंद्र मोदी की सरकार बनी थी, तब से अब तक सौर और पवन ऊर्जा की क्षमता बढ़कर लगभग 93 गीगावाट हो गई है।

इसलिए 2030 तक 500 गीगावाट नवीकरणीय ऊर्जा के लक्ष्य को हासिल करना एक बड़ी चुनौती होगी। इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए स्थापित क्षमता में बड़ी वृद्धि करनी होगी और उसके लिए बड़े प्रयास करने होंगे। सौर और पवन ऊर्जा के क्षेत्र में अंतर्राष्ट्रीय निवेश की भारी जरूरत होगी। साथ ही केंद्र और राज्य सरकार की नीतियों की भी महती भूमिका रहने वाली है। 

न केवल बिजली बल्कि भारत की कुल ऊर्जा मांग का लगभग 80 प्रतिशत की पूर्ति कोयले, तेल और बायोमास से ही पूरा होता है। देश में नए ताप विद्युत संयंत्रों का निर्माण बंद कर देने पर भी कोयले का उपयोग बढ़ने की उम्मीद है। लाखों परिवार अभी भी खाना पकाने के लिए सस्ते बायोमास पर निर्भर हैं और उन्हें स्वच्छ प्राकृतिक गैस पर स्विच करने में मदद करने की पहल को बढ़ावा देने की आवश्यकता होगी। संक्षेप में, इस ऊर्जा मिश्रण में परिवर्तन लाने के लिए नवीकरणीय ऊर्जा की क्षमता बढ़ाने के साथ-साथ और भी कई परिवर्तन करने होंगे, विशेषज्ञ मानते हैं। 

भारत के आर्थिक विकास के साथ ऊर्जा की मांग भी बढ़ेगी। सदी की शुरुआत के बाद से अब तक वैसे भी, ऊर्जा की मांग दोगुनी हो चुकी है। लाखों घरों में बिजली के कनेक्शन जुड़ गए हैं और इतनी ही संख्या में रेफ्रिजरेटर और एसी जैसे उपकरण भी बढ़े हैं। लोगों के जीवन स्तर में सुधार होने के साथ इन चीजों की मांग भी बढ़ रही है। 

बढ़ती मांग को पूरा करने का मतलब न केवल सौर और पवन ऊर्जा की क्षमता में विस्तार करना होगा बल्कि हाइड्रो पावर की क्षमता में भी विस्तार करना होगा। हाइड्रो पावर का विस्तार आसान नहीं होने वाला है क्योंकि देश में ऐसी योजनाओं का कड़ा विरोध होता है। बिजली वितरण में भी होने वाले घाटे को कम करना होगा। 

यह भी ध्यान में रखा जाना चाहिए कि भारत का अभी तेजी से औद्योगीकरण हो रहा है। नतीजतन, स्टील, सीमेंट, रसायन और अन्य कार्बन-उत्सर्जन करने वाले सामग्री का उत्पादन बढ़ेगा और ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन भी। इससे निपटने के लिए देश को आधुनिक तकनीकी का इस्तेमाल करना होगा, स्वच्छ ईंधन को प्रोत्साहित करना होगा और कार्बन सोखने पर निवेश बढ़ाना होगा। आखिर में देश की नौकरशाही को भी चुस्त करना होगा जो अपने लाल फ़ीताशाही और लेटलतीफी के लिए मशहूर  है। प्रशासन का यही तबका इन योजनाओं को जमीन पर लागू करने के लिए जिम्मेदार होगा। 

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