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सौर ऊर्जा / क्या झारखंड में ‘जोहार योजना’ से बदलेगी किसानों की किस्मत?

सोलर पंप के साथ समूह की महिलाएं। भूजल संरक्षण के लिए इन सोलर पंप का इस्तेमाल सिर्फ सतही पानी को पंप करने में किया जा सकता है। चित्र : श्रीकांत चौधरी

  • श्रीकांत चौधरी।

झारखंड के अधिकतर किसान खेती के लिए बारिश पर निर्भर हैं और पानी की कमी के कारण ज्यादातर किसान अपनी पूरे खेत में खेती तक नहीं कर पाते। किसानों की आमदनी बढ़ाने के लिए झारखंड में ‘जोहार योजना’ के तहत महिला किसानों के समूह को सौर ऊर्जा से चलने वाले पंप दिए जा रहे हैं। स्थायी पंप के साथ-साथ इसमें साइकिल पंप भी दिए जा रहें हैं जिससे छोटे-सीमांत किसान अपने खेत की सिंचाई कर सकें।

जोहार योजना की एक खास बात यह है कि इसमें बोरिंग कर भूजल के दोहन की इजाजत नहीं दी जाती। केंद्र की कुसुम योजना में जहां एक तरफ भूजल के दोहन का डर बना हुआ है वहीं जोहार योजना के इस प्रावधान से जल संवर्धन की उम्मीद भी बढ़ी है।

झारखंड के खूंटी जिले की रहने वाली परमेश्वरी देवी के पास तीन एकड़ खेती योग्य जमीन है पर उन्होंने पहली बार अपने पूरे खेत पर धान की रोपाई की। वह भी डीजल के लिए भाग-दौड़ किये बिना। पिछले साल जहां इन्होंने कुल 12 क्विंटल धान उपजाया, इस बार 30 क्विंटल धान की उपज हुई। करीब 1,200 रुपये प्रति क्विंटल की कीमत पर बेचा और 36,000 रुपये की आमदनी हुई।

इस नई उपलब्धि से उत्साहित परमेश्वरी देवी के पति झगरू पाहन इस साल रबी के मौसम में सब्जी उगाने की तैयारी कर रहे हैं। अगर आमदनी प्लान के मुताबिक हुई तो परमेश्वरी देवी अपने तीनों बच्चों को शहर के निजी स्कूल भेजेंगी। अभी तीनों गांव के सरकारी स्कूल में पढ़ते हैं। परमेश्वरी और झगरु के उम्मीदों को पंख लगने का श्रेय एक सोलर पंप को जाता है जो इस साल राज्य सरकार की तरफ से मिला है।

झारखंड में ऐसे कई किसान हैं जो सिंचाई की व्यवस्था न होने की वजह से अपनी पूरी जमीन पर खेती नहीं कर सकते। इंडिया स्टेट ऑफ फॉरेस्ट रिपोर्ट, 2019 वॉल्यूम 2  से झारखंड के कमजोर सिंचाई व्यवस्था का पता चलता है। इसके अनुसार झारखंड का कुल भौगोलिक क्षेत्रफल 7,972 हजार हेक्टेयर है। इसमें से केवल 1,385 हजार हेक्टेयर शुद्ध बोया गया क्षेत्र है। कुल क्षेत्रफल का 17.37 फीसदी। यहां लगभग 31 प्रतिशत भूमि परती है।

झारखंड के साथ ही अस्तित्व में आए छत्तीसगढ़ की भौगोलिक, सामाजिक और आर्थिक स्थिति लगभग एक समान है। पर यहां झारखंड की तुलना में शुद्ध बोआई क्षेत्र का प्रतिशत काफ़ी बड़ा है। छत्तीसगढ़ का शुद्ध बोया गया क्षेत्र इसके भौगोलिक क्षेत्र का 33.94 प्रतिशत है।

झारखंड सरकार के जल संसाधन विभाग के अनुसार राज्य के कुल क्षेत्रफल का लगभग 37 प्रतिशत भूमि खेती योग्य है, पर झारखंड में कृषि मुख्य रूप से वर्षा पर निर्भर है। राज्य में कुल बोए गए क्षेत्र के सिर्फ़ 15 फ़ीसदी हिस्से में ही सिंचाई की सुविधा है और 6 फ़ीसदी से भी कम किसान परिवारों के पास सिंचाई का कोई उपकरण उपलब्ध है।

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के रांची स्थित रिसर्च कॉम्प्लेक्स फॉर ईस्टर्न रीजन में मृदा एवं जल पर शोध करने वाले वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ संतोष माली कहते हैं कि झारखंड में भूजल जितना रिचार्ज होता है, सिंचाई के लिए, उसका 15 प्रतिशत से भी कम निकाला जाता है।

सिंचाई की क्षमता बढ़ाने की कोशिश

परमेश्वरी देवी जैसे किसानों की मदद के लिए वर्ष 2017 में जोहार योजना की शुरुआत की गई। झारखंड सरकार के ग्रामीण विकास विभाग के इस योजना को 14.3 करोड़ डॉलर का वित्तीय सहयोग वर्ल्ड बैंक से मिला है जिससे किसानों की आमदनी बढ़ाने की कोशिश की जा रही है।इसके तमाम प्रावधान में एक, सौर ऊर्जा आधारित सिंचाई पंप किसान समूहों को देना भी शामिल है जिसमें 13 ज़िलों के 39 प्रखंडों में सौर ऊर्जा पंप दिया जाना है।

इस परियोजना के बारे में इसके राज्य संयोजक (सिंचाई) संजय दास बताते हैं। इनके अनुसार, अब तक 11 ज़िलों के 36 प्रखंडों में यह योजना जमीन पर पहुंच चुकी है। यह एक माइक्रो लिफ़्ट सिंचाई योजना है। इसमें मुख्यतः दो प्रकार के सोलर कृषि पंप का प्रावधान है। पहला है, उच्च क्षमता वाले सोलर पंप जिसमें 5 से 7.5 हॉर्स पावर (एचपी) क्षमता वाले सोलर पंप दिए जाने हैं। ऐसे पंप एक निश्चित जगह पर लगेंगे और प्रतिदिन 15 -20 एकड़ भूमि सिंचाई कर सकते हैं।

छोटे और सीमांत किसानों को ध्यान में रखकर दो पहिये और तीन पहिये पर चलने वाला चलंत सौर कृषि पंप उपलब्ध कराने का भी प्रावधान है। ऐसे पंप को आसानी से  एक से दूसरे जगह ले जाया जा सकता है। ऐसे पंप की क्षमता 0.5 से 1 (एचपी) तक होती है।

संजय दास इस परियोजना पर प्रकाश डालते हुए कहते हैं, ‘यह एक माइक्रो लिफ़्ट इरीगेशन स्कीम है, इसको सीमांत और छोटे किसानों को ध्यान में रख कर तैयार किया गया है। सोलर पंप किसी एक किसान को निजी तौर पर न देकर किसान समूहों को दिया जाता है। एक समूह में 15-20 किसान होते हैं।’

इस योजना के अंतर्गत जून 2022 तक कुल 1,310 सौर ऊर्जा संचालित अचल माइक्रो लिफ़्ट इरिगेशन यूनिट तथा 1000 चलंत सौर कृषि पंप लगाने का लक्ष्य रखा गया है। इस लक्ष्य अंतर्गत 26,200 एकड़ भूमि तक सिचाई पहुंचाई जानी है। इससे कुल 23,580 किसान परिवारों को लाभ मिलने का अनुमान है। इस योजना की एक और खास बात है कि इसका प्रबंधन और स्वामित्व समुदाय  के पास होता है। सोलर पंप मिलने के बाद इसके रख-रखाव की जिम्मेदारी उस समूह की हो जाती है।

हर समूह अपने समूह से एक टेक्निकल सर्विस प्रोवाइडर (टीएसपी) चुनते हैं और उस सदस्य को सोलर पंप संचालन और रख रखाव के लिए प्रशिक्षित किया जाता है। परमेश्वरी देवी अपने किसान समूह की टीएसपी हैं। कहती हैं, “हमारे महिला समूह में 51 सदस्य हैं जिनमे 35 खेती किसानी करतीं हैं और हमने सौर पंप का सेवा शुल्क 50 रुपये प्रति दिन रखा है। हम इस पैसे को अलग से जमा करते जाते हैं ताकि भविष्य में जब मशीन को मरम्मत की जरूरत पड़े तब यह पैसा काम आ सके।” 

जल संचयन की उम्मीद जगाती योजना

किसानों को मुफ़्त बिजली या सौर ऊर्जा के पंप देने की अपनी चुनौती रही है। उदाहरण के लिए प्रधानमंत्री किसान ऊर्जा सुरक्षा एवम उत्थान महाअभियान (पीएम कुसुम) के तहत भी किसानों को सौर ऊर्जा से चलने वाले पंप कम लागत (सब्सिडी) पर उपलब्ध कराए जाते हैं। कुसुम योजना के अंतर्गत केंद्र सरकार ने 20,00,000 सौर ऊर्जा से चलने वाले कृषि पंप की स्थापित करने का लक्ष्य रखा है।

हालांकि केंद्र सरकार की इस योजना में भूजल का अत्यधिक दोहन, चिंता का विषय रहा है। राजस्थान के परिप्रेक्ष्य में वर्ष 2020 में एक अध्ययन में कहा गया है कि किसान भूजल को निजी संपत्ति मानते हैं। अधिक से अधिक पानी निकालने को अपनी उपलब्धि समझते हैं। इस अध्ययन में यह संभावना जतायी गई है कि सौर पंप से किसान भूजल का अधिक दोहन कर सकते हैं।

महाराष्ट्र के जलगांव में ऐसे अनुभव हो चुके हैं कि पहले किसानों को बिजली रात में दी जाती थी। फिर वहां सौर पंप लगाए गए और भूजल का स्तर नीचे चला गया। यानी दिन मे बिजली मिली तो किसानों को अधिक देर तक पंप चलाने का मौका मिला। 

पर्यावरण के मुद्दों पर सक्रिय एक स्वयंसेवी संस्था इंटरनेशनल फोरम फॉर इनवायरनमेंट, सस्टेनेबिलिटी एंड टेक्नोलॉजी (आई फॉरेस्ट) में अक्षय ऊर्जा और जलवायु परिवर्तन विभाग की प्रबंधक मांडवी सिंह कहती हैं, ‘पंजाब और हरियाणा जैसे राज्यों में मुफ़्त बिजली मिलने से भूजल के अत्यधिक दोहन का मामला स्थापित हो चुका है। सौर ऊर्जा से चलने वाले पंप में भी कोई लागत नहीं लगने वाली इसलिए यहां भी यह डर तो रहेगा ही।’

सनद रहे कि भारत में सिंचाई की वजह से भूजल का स्तर बहुत तेजी से नीचे जा रहा है। 2018 में आए एक अध्ययन में कहा गया है कि उत्तर भारत में भूजल का स्तर 19.2 गीगाटन प्रति वर्ष के हिसाब से नीचे जा रहा है। जोहार योजना को डिजाइन करते हुए इन सब बातों का ध्यान रखा गया है और बोरिंग करने पर प्रतिबंध है। संजय दास कहते हैं, ‘जोहार परियोजना के अंदर हमलोगों का पहले से तय है कि सिंचाई के लिए हम सिर्फ सब सतह जल का ही इस्तेमाल करेंगे। भूजल के निकासी पर प्रतिबंध रहेगा।’

झारखंड के नजरिए से देखें तो इसका महत्व और अधिक हो जाता है। यहां ज़्यादातर सतही जल ही उपलब्ध है। सरकारी आंकड़े के अनुसार राज्य में कुल 7,296 जलाशय, 35,952 तालाब, 361 पानी के झरने और 4,772 के लगभग अन्य सतह के जल स्रोत हैं। इसके अलावा 2,663 जल संरक्षण-सह-भूजल रिचार्ज योजनाएं/ चेक डैम आदि हैं। हालांकि, रिपोर्ट में भूजल में कुओं को भी शामिल किया गया है और उनकी संख्या पूरे राज्य भर 1,77,923 हैं।

इतने के बावजूद भी झारखंड में वर्षा जल का संरक्षण काफी कम है। झारखंड में वार्षिक औसत वर्षा 1,200 मिमी के क़रीब होती रही है। पर इसका जल संरक्षण और भूजल रिचार्ज की पर्याप्त व्यवस्था न होने के कारण यह पानी, नदी के रास्ते समुद्र में जाकर मिल जाता है। सत्यव्रत आचार्य जो झारखंड में कृषि क्षेत्र में लंबे समय काम करते रहें हैं। आचार्य प्रदान नाम के गैरसरकारी संगठन के झारखंड के प्रभारी रहें हैं वो कहते हैं, ‘विभिन्न अध्ययनों के अनुसार 75 फ़ीसदी वर्षाजल छोटी-छोटी नदियों, नालों में बह के दामोदर, स्वर्णरेखा जैसी बड़ी नदियों या जलाशय में चला जाता है।’

कितना लागू हो पाएगी यह योजना

अगर कृषि क्षेत्र में देखा जाए तो बीज, खाद और दवाओं के साथ सिंचाई में एक किसान को काफी निवेश करना पड़ता है। हाल ही में आए राष्ट्रीय प्रतिदर्श सर्वेक्षण में यह खुलासा हुआ कि सबसे कम जोत वाला किसान जिसके पास 0.024 एकड़ भूमि है वह हर महीने करीब 217 रुपये सिंचाई पर खर्च करता है।  

आई फारेस्ट की मांडवी सिंह कहती हैं, ‘सौर ऊर्जा से चलने वाले सिंचाई पंपों में आर्थिक और पर्यावरणीय दोनों दृष्टिकोणों से ग्रामीण भारत में डीजल पंपों की जगह लेने की उत्कृष्ट क्षमता है। जहां किसानों को सौर जल पंपों का विकल्प पेश किया गया है वहां डीजल पंप खपत 30% से 90% तक कम हो गई है।’

हालांकि इस योजना के अंतर्गत सौर पंप देने की गति काफी कम है। जून 2022 तक 1310 सौर ऊर्जा संचालित माइक्रो लिफ़्ट इरीगेशन यूनिट को लगाने का लक्ष्य रखा गया है। पिछले तीन सालों में सिर्फ़ 850 पंप ही लग पाए हैं या लगने की प्रक्रिया में हैं। एक वर्ष से भी कम समय में 460 पंप अभी और लगने हैं।

खूंटी ज़िले के मुरहू प्रखंड के जामरा गांव के रुमुल सोए को सौर कृषि पंप से बहुत उम्मीद है और इसका मिलने का इंतज़ार पिछले एक साल से कर रहे हैं। रुमुल सोए विचलित होकर कहते हैं, ‘हमारे समूह के लिए हमने एक साल पहले से ही आवेदन दे रखा है पर अभी तक पंप नहीं मिल पाया। इसी तरह चलंत सौर कृषि पंप के वितरण का मामला धीमा है। जून 2022 तक कुल 1000 ऐसे पंप वितरित करने का लक्ष्य रखा गया है पर अभी तक सिर्फ़ 600 ही किसानों तक पहुंच पाए हैं।’  

सिंचाई से जुड़े बड़े सवाल

सवाल यह है कि अगर जोहार योजना समय पर सारे सौर ऊर्जा पंप वितरित कर भी दे तो क्या ये कोई व्यापक बदलाव ला सकेगा? तो वहीं, स्वंय सेवी संस्था ‘प्रदान’ के सत्यव्रत आचार्य एक महत्वपूर्ण पहलू की ओर ध्यान दिलाते हुए कहते हैं, ‘यह योजना कुछ चुनिंदा ब्लॉक के उन गांव को लाभ दे सकता है जो किसी नदी या जलाशय के इर्द-गिर्द बसे हुए हैं और वहां साल भर पानी उपलब्ध हो। पर ऐसे गांव हर ब्लॉक में सीमित हैं।’

सरकार इस चुनौती से निपटने के लिए कमर कस रही है ताकि इस योजना का अधिक से अधिक विस्तार हो सके। जोहार परियोजना के दावे के अनुसार माइक्रो लिफ्ट सिंचाई के लिए पानी के स्रोत का 70% सीपेज कुओं के माध्यम से आना है। इसका जल पुनर्भरण स्वतः संभव है। जल स्रोत का 30% मौसमी धाराओं में छोटे चेक डैम और अन्य तटबंधों के निर्माण के माध्यम से विकसित किया गया है या किया जा रहा है।

नोट : यह फीचर, सोल्यूशन जर्नलिज्म नेटवर्क ‘लीड’ फेलोशिप के सहयोग से है। इसका उद्देश्य वैश्विक स्तर पर समाधान पत्रकारिता का विस्तार करना है।

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