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दिनचर्या / रखें इन बातों का ध्यान, मिलेगा समस्याओं से समाधान

अध्यात्म ‘जीने के मार्ग’ पर चलने की राह दिखाता है और आध्यात्मिक प्रक्रिया जीवन और मृत्यु के बारे में नहीं होती बल्कि शरीर का जन्म व मृत्यु होती है। सरल शब्दों में कहें तो, आध्यात्मिक प्रक्रिया आपके बारे में होती है, जो कि न तो जीवन है और न ही मृत्यु।

अगर इसे और भी आसान शब्दों में कहा जाए तो इस पूरी आध्यात्मिकता का मकसद उस चीज को हासिल करने की कोशिश है, जिसे यह धरती आपसे वापस नहीं ले सकती। आपका यह शरीर इस धरती से लिया गया कर्ज है, जिसे यह धरती पूरा का पूरा आपसे वापस ले लेगी। लेकिन जब तक आपके पास यह शरीर है, तब आप इससे ऐसी चीज बना सकते हैं या हासिल कर सकते हैं, जो धरती आपसे वापस न ले पाए।

आप प्राणायाम करें या ध्यान, आपकी ये सारी कोशिशें आपकी जीवन ऊर्जा को एक तरह से रूपांतरित करने का तरीका हैं, ताकि ये शरीर को पोषण देने के अलावा कुछ ऐसे सूक्ष्म तत्व का निर्माण कर सके, जो शारीरिक पोषण की अपेक्षा ज्यादा टिकाऊ हो। अगर आप इस सूक्ष्म तत्व को पाने की कोशिश नहीं करेंगे तो जीवन के अंत में जब आपसे कर्ज वसूली करने वाले आएंगे तो वे आपसे सब चीज ले लेंगे और आपके पास कुछ नहीं बचेगा। उसके बाद की आपकी यात्रा का हिस्सा अच्छा नहीं होगा।

आध्यात्मिक गुरु सदगुरु जग्गी वासुदेव के अनुसार, मन की प्रकृति हमेशा संग्रह करने की होती है। जब वह स्थुल रुप में होता है तो चीजों का संग्रह करता है। जब यह थोड़ा विकसित होता है तो ज्ञान का संग्रह करना चाहता है। मन एक संग्रह कर्ता है और हमेशा हमेशा कुछ ना कुछ बटोरना चाहता है। ये सारी बातें जिन्हें आप सोचते और महसूस करते हैं और स्वयं के बीच जब एक दुरी बनाने लगते हैं तो इसे ही हम चेतना कहते हैं। जब चेतना विकसित होती है तब आध्यात्मिकता के राह पर चलना पहले की अपेक्षा आसान हो जाता है।

श्री राम शर्मा आचार्य के अनुसार, ‘अध्यात्म का सीधा अर्थ आत्मीयता का विस्तार है। प्रेम ही परमेश्वर है का सिद्धांत यहां अक्षरशः लागु होता है। वासना के आकर्षण में प्रेम की संभावना ही उन्माद पैदा करती है। वासना के अंधकार में प्रेम प्राय: लुप्त हो जाता है। वासना के ना रहने में प्रेम की सच्चाई इतनी मार्मिक होती है कि प्रेम देने वाला और प्रेम पाने वाला दोनों ही धन्य हो जाते हैं।’

आध्यात्मिकता व्यक्ति के आंतरिक एवं बाह्य जीवन को प्रभावित करने का लगातार प्रयास करती है। आत्म-निर्माण के क्रम में आत्म-सुधार करते हुए मानव मन को पवित्र करती है। आध्यात्मिकता को प्राचीन भाषा में ब्रम्हविद्या कहा गया है। यह चिंतन और आदर्श कर्तव्य की जीवन पद्धति है। इसे अपनाने से मनुष्य के भीतर संतुष्टि का भाव उत्पन्न होता है। मनुष्य के संपूर्ण विकास का, उसके जीवन के सफलता का आधार आध्यात्मिकता ही है।

अध्यात्म की नजर से दुनिया को देखें तो वास्तविकता में न सुख है, न दुख है। सुख-दु:ख तो मात्र एक विचार है। एक के लिए एक घटना दु:ख का संदेश लाती है, तो दूसरे लिए वही घटना भविष्य के लिए सुख की आहट देती है और इन सभी घटनाओं में खुद को शांत रखते हुए जीने की राह पर चलना ही अध्यात्म है।

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