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खजुराहो : ‘काम से निवृत होकर’, ध्यान की ओर पहुंचने का स्थान

चित्र सौजन्य : खजुराहो स्थित एक मंदिर के पत्थरों पर उकेरी गईं वास्तु कलाकृतियां।

खजुराहो में, पत्थरों पर उत्कीर्ण की गई कामुक कलाकृतियों के लिए दुनिया भर में प्रसिद्ध है, लेकिन इन कलाकृतियों के बनाने के पीछे छिपे उद्देश्य का महत्व गंभीर और सार्थक है। यह कलाकृतियां मंदिर के बाहरी भाग में हैं, जिसका अर्थ है हर तरह के काम भावना से निवृत होकर एकात्म के भाव यानी ईश्वर के ध्यान में समाहित हो जाना है। इस विषय के बारे में अलग-अलग लोगों के अलग-अलग विचार और अपने मत हैं।

बहरहाल, खजुराहो आध्यात्मिक केंद्र होने के साथ विश्व का प्रसिद्ध पर्यटन स्थल भी है। ब्रिटिश इंजीनियर टीएस बर्ट ने खजुराहो के मंदिरों की खोज की। इस स्थान को युनेस्को ने 1986 में विश्व विरासत की सूची में शामिल किया है।

खजुराहो का इतिहास करीब एक हजार साल पुराना है। यह ऐतिहासिक स्थल मौर्य, सुंग, कुषाण, पद्मावती के नागा, वाकाटक वंश, गुप्त, पुष्यभूति राजवंश और गुर्जर-प्रथारा राजवंश के शासन का अंग रहा है। यहां विशेष रूप से गुप्त काल के दौरान वास्तुकला और कला का विकास शुरू हुआ, इसके उनके उत्तराधिकारियों ने कलात्मक परंपरा जारी रखी। यह शहर चंदेल साम्राज्‍य की प्रथम राजधानी था। चन्देल वंश और खजुराहो के संस्थापक चन्द्रवर्मन थे।

चन्द्रवर्मन मध्यकाल में बुंदेलखंड में शासन करने वाले राजपूत राजा थे। वे अपने आप को चन्द्रवंशी मानते थे। चंदेल राजाओं ने दसवीं से बारहवी शताब्दी तक मध्य भारत में शासन किया। उनके बारे में कई किंवदंतियां और कहानियां हैं। खजुराहो के मंदिरों का निर्माण 950 ईसवीं से 1050 ईसवीं के बीच चन्देल राजाओं द्वारा किया गया। मंदिरों के निर्माण के बाद चन्देलो ने अपनी राजधानी महोबा स्थानांतरित कर दी। लेकिन इसके बाद भी खजुराहो का महत्व बना रहा जो आज भी है।

यह ऐतिहासिक स्थल हिन्दू और जैन धर्म के स्मारकों का समूह है, जो मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले मे हैं। क्षेत्र में देखने को मिलते है। खजुराहो झांसी से लगभग 175 किलोमीटर की दूर है। यहां केवल वर्तमान में 25 मन्दिर हैं। कंदरिया महादेव मंदिर प्राचीन भारतीय कला के जटिल विवरण, प्रतीकवाद और काम अभिव्यक्ति के साथ यहां मौजूद है।

चित्र : खजुराहो स्थित एक मंदिर का बाहरी दृश्य।

भारतीय पुरातत्व विभाग द्वारा संचालित खजुराहो संग्रहालय को चार विशाल गृहों में बांटा गया है, जिनमें शैव, वैष्णव, जैन और 100 से अधिक विभिन्न आकारों की मूर्तियां हैं। संग्रहालय में विशाल मूर्तियों का समूह काममुद्रा में हैं। इसमें विष्णु की प्रतिमा को मुंह पर अंगुली रखे चुप रहने के भाव के साथ दिखाया गया है। संग्रहालय में चार पैरों वाले शिव की एक सुन्दर मूर्ति है। जैन संग्रहालय में लगभग 100 जैन मूर्तियां हैं। जबकि जनजातीय राज्य संग्रहालय में जनजाति समूहों द्वारा बनाई गईं पक्की मिट्टी की कलाकृतियां, धातु शिल्प, लकड़ी शिल्प, पेंटिंग, आभूषण, मुखौटों और टेटुओं को दर्शाया गया है।

हवाई मार्ग द्वारा, कैसे पहुंचें : खजुराहो में एक हवाई अड्डा है जो दिल्ली, आगरा, वाराणसी और मुंबई को सेवाएं प्रदान करता है।

ट्रेन द्वारा, कैसे पहुंचें : खजुराहो मंदिर खजुराहो रेलवे स्टेशन और छतरपुर रेलवे स्टेशन के माध्यम से रेलवे से जुड़ा है, जो 45 किमी है। खजुराहो से यह दिल्ली और झांसी से अच्छी तरह से जुड़ा हुआ है।

सड़क के द्वारा, कैसे पहुंचें : खजुराहो मंदिर जिला छतरपुर से लगभग 50 किमी दूर हैं। यह भारत के विभिन्न शहरों जैसे दिल्ली, भोपाल की सड़कों से अच्छी तरह से जुड़ा हुआ है। राष्ट्रीय राजमार्ग 86 इसे राज्य की राजधानी भोपाल से जोड़ता है।

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